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    जानें कैसे हुआ हरियाणा के रत्नावली उत्सव का नामकरण

    Ratnavali

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    सच कहूँ, देवीलाल बारना
    कुरुक्षेत्र। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में प्रत्येक वर्ष हरियाणा दिवस के अवसर पर आयोजित होने वाले (Ratnavali) रत्नावली उत्सव हरियाणा ही नही देश विदेश का चर्चित उत्सव माना जाता है। रत्नावलीके नाम को लेकर लोगों के मन में भ्रम रहता है कि आखिर इस उत्सव का नाम रत्नावली कैसे पड़ा? बता दें कि रत्नावली नामकरण सातवीं सदी के थानेसर के इतिहास का साक्षी है। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय में आयोजित रत्नावली समारोह में बृज क्षेत्र की नृत्यांगना को प्रतीक चिह्न के रूप में स्थापित किया गया है।

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    रत्नावली राज्य स्तरीय सांस्कृतिक समारोह का आयोजन 28 से 31 अक्टूबर तक

    वास्तव में हरियाणा तथा बंचारी में होली के अवसर पर नृत्य की परम्परा रही है। केयू के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग द्वारा रत्नावली राज्य स्तरीय सांस्कृतिक समारोह का आयोजन 28 से 31 अक्टूबर तक किया जा रहा है, जिसमें प्रदेशभर के कलाकार अलग-अलग मंचों से अपनी प्रतिभा का परिचय देंगे। रत्नावली का लॉगो वास्तव में हरियाणा की सांस्कृतिक पहचान का परिचायक है।

    राजा हर्षवर्धन द्वारा लिखित है नाटक ‘रत्नावली : डा. पूनिया

    युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि रत्नावली नामकरण का इतिहास महाराजा हर्ष वर्धन से जुड़ा हुआ है। राजा हर्षवर्धन द्वारा लिखित नाटक ‘रत्नावलीÓ के दो पात्र चरचरी एवं हलिष्का नृत्यांगना के रूप में विख्यात रही हैं। यही परम्परा हरियाणवी लोकजीवन में सदियों पुरानी चली आ रही है। हर्षवर्धन के समय में कुरुक्षेत्र की राजधानी थानेसर में एक महीने तक मदनोत्सव मनाया जाता था। लोकजीवन में इसे हम फागण उत्सव भी कह सकते हैं। इस प्रकार लोकजीवन में फागण के महीने में नृत्य की परम्परा हरियाणवी लोकजीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा रही है।

    बृज के घरों में होली गायन एवं नृत्य परम्परा आज भी जीवंत है

    फागण में हरियाणा के सभी क्षेत्रों खादर, बांगर, बागड़, अहीरवाल, बृज, मेवात सभी क्षेत्रों यह परम्परा देखने को मिलती रही है। बृज क्षेत्र में यह परम्परा दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा अधिक है, क्योंकि वहां पर श्रीकृष्ण और राधा लोकजीवन का ऐसा महत्वपूर्ण हिस्सा हैं जो फागण उत्सव का हिस्सा बन उसे आज भी जीवित रखे हुए है। यही कारण है कि बृज के घरों में होली गायन एवं नृत्य परम्परा आज भी जीवंत है। इस परम्परा में वहां की महिलाएं पुरुषों के होली गायन के साथ नृत्य भी करती हैं। हरियाणा के बंचारी क्षेत्र में यह परम्परा लोकजीवन का गूढ़ हिस्सा हैं।

    बंचारी में नाचती हुई महिला का फोटो खींचा तो बन गया लोगो

    कुवि सांस्कृतिक विभाग के पूर्व निदेशक अनूप लाठर ने बंचारी नृत्य की जब वर्ष 1988 में डॉक्यूमेंटेशन की तो उन्होंने पाया कि बंचारी में नृत्य करते हुए महिलाएं इसी स्वरूप में नाचती हैं। उन्होंने होली के अवसर पर नाचती हुई महिला का चित्र खींचा। यही चित्र वास्तव में लोक पारम्परिक नृत्य का हिस्सा है। लोकनृत्य रसिया की पद्चाप एवं परम्परा हरियाणा के दूसरे नृत्यों से भिन्न है।

    वास्तव में यह चित्र बंचारी की नाचती हुई महिला का चित्र है, जिसको कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम विभाग के तत्कालीन निदेशक अनूप लाठर ने होली के अवसर पर बंचारी की महिला का नृत्य करते हुए चित्र को ही रत्नावली समारोह के प्रतीक चिह्न के रूप में स्थापित किया। उनके प्रयास से विभाग के कलाकार आरएस पठानिया ने इसके अनेक चित्र भी अंकित किए और धीरे-धीरे यह रत्नावली के प्रतीक के रूप में एक अलग चिह्न स्थापित हो गया। कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय के युवा एवं सांस्कृतिक विभाग ने इसे रत्नावली के प्रतीक चिह्न के रूप में अपनाकर लोक सांस्कृतिक परम्परा को समारोह के साथ जोड़ दिया गया। अब रत्नावली का यह लॉगो प्रतीक का रूप धारण कर चुका है तथा रत्नावली का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

    रत्नावली की प्रत्येक जगहों पर अंकित है रत्नावली का यह चिन्ह

    रत्नावली के सभी बैनरों, चित्रकला एवं टी-शर्ट आदि पर यह प्रतीक चिह्न स्थापित किया जा रहा है। विभाग के निदेशक डॉ. महासिंह पूनिया ने बताया कि इससे पूर्व हरियाणा दिवस पर आयोजित राज्य स्तरीय समारोह को हरियाणा दिवस समारोह के नाम से जाना जाता था। वर्ष 2006 में इस समारोह का नामकरण रत्नावली के नाम से हुआ। तब से लेकर अब तक रत्नावली कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय का सांस्कृतिक समारोह भारत ही नहीं अपितु विदेशों में भी लोकप्रिय हो चुका है। रत्नावली समारोह को संचालित करने वाली छात्र-छात्राओं की टीम को भी रत्नावली टीम के नाम से जाना जाता है।

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