पूज्य गुरु जी ने की दो और नए मानवता भलाई कार्यों की शुरूआत, जल्द पढ़ें…

Saint Ram Rahim
Saint Ram Rahim पूज्य गुरु जी ने की दो और नए मानवता भलाई कार्यों की शुरूआत, जल्द पढ़ें...

सरसा। पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां ने मंगलवार (13 जनवरी 2026) को दो और मानवता भलाई कार्य शुरू करवाए हैं।

171. आर्थिक तौर पर कमजोर, समाज का भला करने वाले आॅफिसर, पुलिस व पत्रकार उनकी यथा सम्भव मदद करना जैसे जरूरत पड़ने पर खूनदान, परिवार में कोई बीमार है तो इलाज में मदद, बेटियों की शादी में मदद इत्यादि।

172. गऊ माता की झांकी: सरकार की परमिशन से गौचर भूमि को गऊओं की सेवा सम्भाल के लिए तैयार करना, उसमें चारा व पानी का प्रबंध करना, पेड़-पौधे, जंगल लगाना ताकि गर्मियों में गऊएं छाया में आराम व घूम फिर सकें।

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वचन मानने से संवर जाते हैं दोनों जहान

पूज्य हजूर पिता संत गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां फरमाते हैं कि सार्इं मस्ताना जी का बख्शा पाक-पवित्र नाम आज करोड़ों घरों के अंधकार को दूर कर रहा है, करोड़ों घरों को नर्क से निकाल कर स्वर्ग से बढ़कर बना चुका है। ऐसे मुर्शिदे-कामिल, ऐसे सतगुरु-मौला का जितना शुक्राना किया जाए, उतना ही कम है। मुर्शिदे-कामिल ने जो तरीका बताया, बड़ा ही आसान तरीका, चलते, बैठते-लेटते, खाते-पीते, काम-धंधा करते हुए आप जिह्वा ख्यालों से मालिक का नाम जपो, वो दरगाह में मंजूर होगा जोकि बेमिसाल है। पुराने समय में लोग परमात्मा की खोज के लिए जंगलों में चले जाते।
वचन मानने से…सालों-साल बैठे रहते। कई सालों के बाद एक-आध झलक नजर आती। और सार्इं जी ने ऐसा कमाल किया कि परिवार में रहो, काम-धंधा करते रहो और बस, सुमिरन से, मालिक से जुड़े रहो, तो ऐसे रहते हुए भी आप मालिक की कृपा-दृष्टि के रहमो-कर्म से मालामाल हो जाओगे। जो इस घोर कलियुग में चाहे वो गृहस्थी है या त्यागी, मुर्शिदे-कामिल के वचनों को मानता है, यकीनन उसके दोनों जहान संवर जाते हैं। मालिक उन्हें अंदर-बाहर किसी भी तरह की कमी नहीं आने देता। वो खुशियों से लबरेज होते हैं, दिलो-दिमाग से अंधकार दूर हो जाता है और वो परमात्मा की उन तमाम खुशियों के हकदार बनते हैं, जिसकी कल्पना भी कभी नहीं की होती। पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि सुमिरन करना चाहिए और सार्इं अपने मुर्शिदे-कामिल का गुणगान गाते और शुक्राना करते रहना चाहिए, तभी मालिक का रहमो-कर्म होता है और तभी मालिक की तमाम खुशियां मिला करती हैं। आप जी फरमाते हैं कि आदमी को दीनता-नम्रता अपनानी चाहिए और जिस दर को सजदा करता है, जिस मुर्शिदे-कामिल से प्यार-मोहब्बत करता है, उसके लिए जितनी कोई सेवा करे, उतना ही कम होता है।
पूज्य गुरु जी फरमाते हैं कि लोभ-लालच बुरी बला है। सार्इं मस्ताना जी महाराज के एक वृत्तांत का जिक्र करते हुए आप जी फरमाते हैं कि एक बार बहुत सारे सत्संगी खड़े थे और वहां बकरियां घूम रही थी। सार्इं मस्ताना जी महाराज ने ताजे-ताजे नोट बकरियों के गले में बांध दिए और उनको आप ही दौड़ा दिया, ‘अरे, पकड़ो-पकड़ो भाई! सभी ले के भाग गई। अरे…रे…रे इतने नोट!’ चलो, एक-दो भागते, लेकिन सारे के सारे ही भाग गए। ये तो कहा ही नहीं था कि नोट ले लो, सिर्फ पकड़ो ही कहा था, लेकिन सारे झपटे कि मैं ले लूं, मैं ले लूं। सार्इं जी मुस्कुरा कर कहने लगे, ‘सतगुरु दा यार तां कोई-कोई निकल्या, सारे माया दे यार ने।’ आप जी फरमाते हैं कि माया कई तरह की होती है। रुपया-पैसा, हीरे-मोती सब-कुछ ये माया है जो दिखता है। और जो नहीं दिखता आंखों पर माया का पर्दा वो है-नर-नारी। चाहे वो पशु हैं, चाहे आदमी हैं, ये माया से ही एक-दूसरे के प्रति पगलाये हुए हैं। तो ये माया का रूप बड़ा जबरदस्त है। लोग सारा प्यार, सारी सेवा भूल जाते हैं जब माया की बात आती है। कई भाई मंझ जैसे भी होते हैं, जो सब कुछ लुटा के दोनों जहानों को पा जाते हैं। ये तो अपनी-अपनी सोच, अपना-अपना दिमाग है।