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    बदलाव की मांग कर रहा कृषि संकट

    Agricultural Crisis, Change, Grain, Farmer, Government

    आज देश में अनाज का भंडार इतना बढ़ गया कि संभल ही नहीं रहा है। कैग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2011 से 2016 तक 100 करोड़ रुपए से ज्यादा का अनाज बर्बाद हो गया। हर साल लगभग 100 करोड़ से ज्यादा का अनाज खराब हुआ। अनाज की बहुतायत उपलब्धि बनने की बजाए समस्या बनती जा रही है। किसान अनाज के अंबार लगाकर भी खुदकुशियां कर रहा है। अनाज के अधिक उत्पादन के बावजूद किसान की जेब खाली की खाली और कर्जदार है।

    इस संबंध में सरकार, विशेषज्ञ और किसान तीनों को विचार-विमर्श करने की आवश्यकता है। बहुतयात की कभी भी पूछ नहीं होती। अपने पेशे को बदल पाना मुश्किल व जोखिम भरा निर्णय है, लेकिन इसके बिना गुजारा भी नहीं। जब अनाज की पूछ नहीं तो किसान की इज्जत कैसे होगी? किसान को ऐसी परिस्थितियां बनानी होंगी कि सरकार व निजी कंपनियां उनके साथ फसलों की बिजाई संबंधी लिखित करार करें। फिलहाल किसान को अच्छी कीमत के लिए खरीददार को ताकना पड़ता है। कपड़े की दुकान पर मूल्य दुकानदार ही बताता है और ग्राहक को खरीदना होता है। ग्राहक अपनी मर्जी का मूल्य नहीं देता। किसान के लिए ऐसा नहीं। यह तभी संभव होगा यदि उत्पादन सीमित होगा।

    दूसरी ओर लाखों टन अनाज खराब हो जाने के बावजूद कभी कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हो सकी। कारण यही है कि देश में अनाज की कमी नहीं। यदि अनाज खराब होने से भुखमरी का संकट पैदा होगा तो कार्रवाई का स्तर भी बदल जाएगा।किसान नई फसलों की तरफ ध्यान दें और अपनी फसल का पूरा मूल्य प्राप्त करें। किसानों को आत्म चिंतन करने की भी जरूरत है। जब उत्पादन कम था, तब किसान खुशहाल था। उत्पादन बढ़ा तो किसान परेशान हो गया। किसान का संकट पूंजीवादी अर्थव्यवस्था का नहीं, बल्कि उपभोक्ता संस्कृति की भी देन है। पश्चिम से चली दिखावे की रुचि ने सभी बड़े-छोटों को सोच के राजा-महाराजा बना दिया। यह तो पैसों की कमी है, अन्यथा सोच यही बन गई है कि हर कोई लड़के-लड़की का विवाह करने के लिए करोड़ों खर्चने के लिए तैयार है। इससे किसान भी नहीं बच सका।

    देश के एक ही राज्य में यदि हर साल 100 करोड़ से ज्यादा का अनाज मिट्टी में मिल जाए तो किसान खुशहाल कैसे होंगे? आखिर इतने बड़े स्तर पर फसल खेतों में पैदा होकर मंडी में पहुंचती है उसकी अदायगी भी होती है फिर भी किसान कर्ज में डूबा है। कर्ज केवल कृषि में घाटे का नहीं बल्कि अन्य कारणों का भी है। सरकारें हर बार यह कह देती हैं कि सारा कर्ज नहीं केवल कृषि के लिए लिया कर्ज माफ करेंगे। यह मामला किसी एक पक्ष की बयानबाजी से हल होने वाला नहीं बल्कि सभी पक्षों द्वारा किसान पूरी ईमानदारी, सच्चाई और वचनबद्धता से हल करने की जरूरत है।

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