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    1947 के विभाजन कर दर्द-बुजुर्गों की जुबानी: बंटवारे में भारत आए मनोहर लाल ने अंग्रेजी छोड़ संस्कृत पढ़ी, बने शास्त्री

    Manohar Lal sachkahoon

    वर्ष 1961 में लगी सरकारी नौकरी

    • पिता व दादा ने अर्क, शरबत, माजून और त्रिफला की दवा बनाकर बेची

    सच कहूँ/संजय मेहरा, गुरुग्राम। भारत-पाकिस्तान बंटवारे के समय जिंदगी दांव पर लगाकर मात्र आठ साल की उम्र में भारत पहुंचे मनोहर लाल ने मन लगाकर पढ़ाई लिखाई करके कामयाबी हासिल की। वे शुरू में तो अंग्रेजी विषय में पढ़ते थे, लेकिन यहां उनके शिक्षक मदन मोहन शास्त्री ने उन्हें अंग्रेजी से हटाकर संस्कृत की शिक्षा दी। उन्हीं की शिक्षा-दीक्षा से वे शास्त्री बने और सरकारी नौकरी पाई।

    बंटवारे के समय व पूर्व की बातें सांझा करते हुए मनोहर लाल शास्त्री बताते हैं कि उनका परिवार पाकिस्तान में दायरा दी पनाह तहसील तौंसा जिला डेरा गाजी खान में रहता था। उनके पिता जी पंडित कंवरभान और चाचा पंडित मोटन लाल हकीम थे। परिवार का पूरा खर्चा वे ही चलाते थे। मनोहर लाल के अनुसार सन् 1947 में बंटवारे के समय जब अफरा-तफरी मची, तब वे मात्र 8 साल के थे और तीसरी कक्षा में पढ़ते थे। उन्हें ख्वाजा साहब ने अपनी देखरेख में तौंसा शरीफ में रखा। उनके पिताजी ने सोचा था कि वापस अपने घरों में पहुंचा दिया जाएगा। इसलिए वहां से कुछ भी सामान नहीं उठाकर लाए।

    सबसे पहले करनाल पहुंचे, उसके बाद गुरुग्राम में बसे

    ख्वाजा साहब ने ट्रकों में बिठा कर मुजफ्फरगढ़ स्टेशन पर छुड़वा दिया। सभी नदी के किनारे सर्दी में डटे रहे। कुछ दिनों के बाद गाड़ी में बिठा दिया और वे करनाल पहुंचाए गए। उन्हें फिर गांव जुंडला में भेजा गया। वह गांव नदी के किनारे थे। वहां पर उनके पिताजी और दादाजी मजदूरी करते थे। उसी मजदूरी से घर का खर्चा चलता था। ऐसे ही मेहनत मजदूरी करते हुए वहां पर दो साल गुजारे। इसके बाद उन्हें गुरुग्राम में गौशाला के सामने टैंटों में रखा गया। इसके बाद शमशान के पास 40 गज की कोठी मिली। वहां पर उनके पिता जी व दादा जी अर्क, शरबत, माजून और त्रिफला बनाकर दवाई देते थे। उसी से परिवार का गुजारा होता था। इसी कमाई से उन्होंने उन सबको पढ़ाया। उस समय की अच्छी शिक्षा दिलाई।

    35 साल तक शास्त्री के रूप में दी सेवाएं

    मनोहर लाल शास्त्री बताते हैं कि वर्ष 1958 में शास्त्री, सन 1960-61 में एलटीसी की ट्रेनिंग की और 1961 में नौकरी लग गई। वर्ष 1964 में वे नियमित हो गए और 35 वर्ष तक सेवाएं देने के बाद 31 दिसम्बर 1996 को सेवानिवृत्त हुए। परिवार की आर्थिक स्थिति ठीक हुई। आज पूरा परिवार खुशियों के साथ जीवन व्यतीत कर रहा है।

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