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Saturday, February 7, 2026
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    Literature: दस रुपये की जिंदगी

    Literature
    Literature: दस रुपये की जिंदगी

    जीवन चलने का नाम

    Literature: कई साल पहले मैं दिल्ली के एक व्यस्त मेट्रो स्टेशन पर खड़ा था, अपने नए रिज्यूमे को अंतिम रूप देने में व्यस्त। तभी एक छोटी-सी घटना ने मेरे जीवन का नजरिया बदल दिया। एक 8-9 साल की बच्ची, मैले-कुचैले कपड़ों में, मेरे पास आकर खड़ी हो गई। उसने बिना कुछ बोले अपना हाथ फैलाया, नन्हें हाथों में एक फटी-सी किताब थी।

    मैंने जल्दी से जेब टटोली और दस रुपये का नोट निकालकर उसे दे दिया। वह बच्ची उस नोट को लेकर वहीं खड़ी रही। फिर अचानक उसने नोट मुझे लौटा दिया! ‘नहीं भैया, मुझे पैसे नहीं चाहिए, उसने मासूमियत से कहा, मैं तो बस ये पूछना चाहती थी कि क्या आप इस किताब को पढ़कर मुझे समझाएंगे?’ उसने अपने पुराने बैग से एक फटी हुई किताब निकाली- ‘प्राथमिक हिंदी’। ट्रेन का समय कम बचा था।

    जितना समय था, उसमें मैंने उसे वर्णमाला के कुछ शब्द पढ़वाए और नजदीकी स्कूल में रोज पढ़ने की सलाह दी। जिस दिन मैंने असली शिक्षा का मतलब समझा-वह बच्ची- जिसका नाम पूजा था- रोज मेट्रो स्टेशन पर आकर लोगों से पढ़ने में मदद मांगती थी। उसके माता-पिता कूड़ा बीनते थे, लेकिन उसकी पढ़ाई के लिए हर संभव कोशिश कर रहे थे। मेरी टीचर ने कहा है, पूजा ने गर्व से बताया, एक दिन मैं बड़ी होकर टीचर बनूंगी और गरीब बच्चों को मुफ्त पढ़ाऊंगी!

    तीन सबक जो एक बच्ची ने सिखाए | Literature

    • शिक्षा की भूख सबसे ताकतवर होती है: जब आप सचमुच कुछ सीखना चाहते हैं, तो संसाधनों की कमी रास्ता नहीं रोकती।
    • गरिमा दान में नहीं, स्वाभिमान में होती है। पूजा ने पैसे नहीं, ज्ञान मांगा।
    • सबसे बड़ा दान है समय: उस दिन से मैं अपने दोस्तों को हर रविवार गरीब बस्तियों के बच्चों को पढ़ाने के लिए प्रेरित करता हूँ।

    कहानी का अंत नहीं, शुरूआत है। आज पूजा उसी सरकारी स्कूल में पढ़ती है, जहां मेरा दोस्त स्वेच्छा से पढ़ाता है। उसके माता-पिता अब कूड़ा नहीं बीनते, बल्कि हमारे छोटे-से सामुदायिक केंद्र में काम करते हैं। कभी-कभी जिंदगी आपको दस रुपये में ऐसा सबक दे देती है, जो करोड़ों में भी नहीं मिलता। आपके आस-पास भी कोई पूजा हो सकती है। क्या आप उसकी मदद के लिए तैयार हैं? याद रखिए, बदलाव की शुरूआत हमेशा एक छोटे-से कदम से होती है।

                                                                                             एन. डी. बारहठ, लेखक एवं स्तंभकार

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