Agriculture: कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर गंभीरता से हो मंथन

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कृषि क्षेत्र की समस्याओं पर गंभीरता से हो मंथन

Agriculture: विगत वर्ष सरकार द्वारा लाए गए कृषि कानूनों के विरोध में किसानों को लगभग एक साल तक आंदोलन करना पड़ा, अंत में सरकार को तीनों अध्यादेश वापस लेने पड़े। जीवन-मरण के इस संघर्ष में किसानों को आंशिक सफलता भले ही मिल गई, लेकिन जो उनका असल मुद्दा है, वह अब भी जस-का-तस है। एक बार फिर किसान एमएसपी की मांग को लेकर आंदोलन करने को मजबूर हैं। पिछले दिनों हरियाणा के पिपली में आंदोलन हो चुका है। आज भले ही देश को आजाद हुए 75 साल हो गए हों, किसान की स्थिति ज्यों-की-त्यों है। Agriculture

खेती की हालत सुधर नहीं सकी। किसानों की दुर्दशा के लिए सभी सरकारों की नीतियां जिम्मेदार रही हैं। मौजूदा केंद्र सरकार ने 2013-14 में कृषि के लिए बजट में मात्र 21933 करोड़ रुपए था, वहीं इस वर्ष 2023-24 के बजट में 1 लाख 25 हजार करोड़ रुपए की धनराशि का प्रावधान केवल कृषि के लिए किया। 2019 में शुरू की गई प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना के तहत प्रत्येक किसान को प्रति वर्ष छह हजार रुपए के रूप में थोड़ा बहुत आर्थिक संबल मिला है। कई किसान इस धनराशि से समय पर खाद-बीज की व्यवस्था भी कर सकने में सफल हुए। फिर भी केंद्र सरकार ने नीतियों से कृषि क्षेत्र में बदलाव लाने के प्रयास जारी है, लेकिन दूसरी तरफ नीतियों से समस्याएं गंभीर बनती जा रही हैं। Agriculture

इसलिए उसके शासन काल के मात्र तीन साल पूरा होते-होते देश के विभिन्न राज्यों में किसान आंदोलन उठ खड़े हुए। किसान आंदोलन के दौरान भी किसान केंद्र सरकार की नीतियों को पूंजीपतियों का पोषक और शहरी वर्ग केंद्रित बताते रहे हैं। किसानों का कहना है कि एक तरफ राज्य सरकारों को कृषि पैदावार पर बोनस देने से रोका गया, तो दूसरी तरफ एमएसपी में समय के साथ उचित बढ़ोतरी करने की बजाय खाद, कीटनाशक, डीजल आदि जैसे कृषि साधनों की कीमत पर निजीकरण के नाम पर रहा-सहा सरकारी नियंत्रण भी खत्म कर दिया। इस वजह से इन वस्तुओं के दाम तेजी से बढ़े, जिससे खेती और भी अधिक घाटे का व्यवसाय बन गई है। Agriculture

युवाओं का मन खेती से विरक्त होता जा रहा है | Agriculture

यदि देखा जाए, तो भारत की स्वतंत्रता से पूर्व तथा इसके पश्चात एक लंबी अवधि व्यतीत होने के बाद भी भारतीय किसानों की दशा में कोई ज्यादा सुधार दिखाई नहीं देता है। बढ़ती आबादी, औद्योगिकीकरण एवं नगरीकरण के कारण कृषि योग्य क्षेत्रफल में जहां निरंतर गिरावट आ रही है, वहीं घाटे का सौदा होने के कारण युवाओं का मन खेती से विरक्त होता जा रहा है। यह भविष्य में आते हुए खाद्य संकट का एक संकेत है। भारत की अर्थव्यवस्था में कृषि की महत्वपूर्ण भूमिका है। कृषि हमारे आर्थिक सामाजिक एवं आध्यात्मिक उन्नति का माध्यम रही है। भारत के लोगों के लिए कृषि मात्र एक जीविकोपार्जन का साधन नहीं, बल्कि एक जीवन पद्धति है। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार 55 प्रतिशत आबादी कृषि और उससे संबंधित कार्यों में लगी हुई है।

पूर्व प्रधानमंत्री स्व. श्री लाल बहादुर शास्त्री ने नारा दिया था- जय जवान, जय किसान। पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसमें विज्ञान को जोड़ा और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसमें अनुसंधान भी जोड़ दिया है। भारत की कृषि के लिए यह मंत्र बन गया है- जय जवान जय किसान, जय विज्ञान और जय अनुसंधान। कृषि उत्पादों की दृष्टि से उल्लेखनीय तरक्की हुई है, भारत ने 4 लाख करोड़ रु. से अधिक का निर्यात किया है, जो अब तक का सबसे अधिक है। प्राकृतिक खेती व जैविक खेती पर बल देने के कारण इस तरह के उत्पाद दुनिया में और भी ज्यादा लोकप्रिय होने वाले हैं। जिससे भविष्य में निर्यात और बढ़ेगा, इसके लिये जरूरी है कि कृषि उत्पादन की गुणवत्ता वैश्विक मानकों पर खरी उतरने वाली हो, इस पर विशेष ध्यान देना होगा। Agriculture

वर्तमान कीमतों के अनुसार वर्ष 1950-51 में भारत की जीडीपी में कृषि का योगदान 52 प्रतिशत था, जो वर्ष 2013-14 में 18 प्रतिशत रह गया। भारतीय केंद्रीय सांख्यिकी कार्यालय के अनुसार, 2016-17 में कृषि और संबंधित क्षेत्रों का योगदान गिर कर 17.4 प्रतिशत रह गया है। कृषि क्षेत्र में गिरावट के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था में इसका योगदान वैश्विक औसत 6.1 प्रतिशत से अधिक है। विश्व में कृषि योग्य भूमि के मामले में भारत 15.74 करोड़ हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि होने के कारण दूसरे स्थान पर है। दुनिया में मात्र 15 कृषि जलवायु क्षेत्र हैं, जबकि भारत में कृषि जलवायु क्षेत्र की संख्या 20 है। भारत दुनिया के अग्रणी उत्पादक और निर्यातक देशों में शामिल है, यह सब को गर्व अनुभव कराने के लिए पर्याप्त है, लेकिन इतना होते हुए भी किसान आत्महत्या करने पर मजबूर है।

फसल अच्छी न हो ,तो किसान आत्महत्या कर लेता है | Agriculture

आज स्थिति ऐसी हो गई है कि भारतीय किसान कर्ज में जन्म लेता है, कर्ज में ही पूरा जीवन रहता है और कर्ज में ही मर जाता है। हालात यहां तक आ गए हैं कि यदि फसल अच्छी न हो ,तो किसान आत्महत्या कर लेता है और यदि फसल अच्छी हो भी जाए, तो मंडी में उपज का वह दाम नहीं मिलता, जिस दाम की अपेक्षा रख कर वह मेहनत करता है। किसान की आत्महत्या का कारण केवल फसलों का सही प्रकार से मुआवजा नहीं मिल पाना ही नहीं है। भूजल के स्तर में भारी गिरावट भी किसान की बेहाली का सबसे बड़ा कारण माना जा सकती है। Farmer

अभी हाल ही में हैदराबाद में कंसोर्टियम आॅफ इंडियन फार्मर्स एसोसिएशन (सीआइएफए) के बैनर तले 25 से भी ज्यादा संगठनों ने हिस्सा लिया। इसमें सभी ने एक स्वर में 2024 में होने वाले लोकसभा चुनाव के लिए सभी राजनीतिक दलों से किसानों की मांगों को अपने-अपने घोषणापत्र में शामिल करने की मांग की। संगठनों द्वारा किसानों आयोग की स्थापना के साथ केंद्रीय कृषि मंत्री को उपप्रधानमंत्री का दर्जा, व्यवसाय की तर्ज पर कर्मचारियों की तरह किसानों की आय सुनिश्चित करने के उपाय के साथ मनरेगा में किसानों को सम्मिलित करने की मांग शामिल है।

सरकार द्वारा प्रसंस्करण उद्योगों को कच्चे माल की आपूर्ति करने वाले किसानों के साथ लाभ साझा करने के लिए प्रोत्साहन देने की भी मांग की गई। विकसित देशों में किसानों को प्रति हेक्टेयर सीधे-सीधे खेती करने के लिए सब्सिडी दी जाती है। यूरोपीय देशों की तरह सरकार को भी किसानों की एकमुश्त आमदनी सुनिश्चित करनी चाहिए। खेती के सहायक उद्योग पशुपालन और अन्य उद्योगों को बढ़ावा देना चाहिए, जिनका उद्देश्य किसानों की आमदनी को बढ़ाते हुए, उनके जीवन स्तर को सुधारना है। देश का भाग्य विधाता किसान तभी चैन की नींद सो पाएगा। Artical

केसी त्यागी, राज्य सभा के पूर्व सदस्य (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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