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    आधुनिकता की दौड़ में कुंभकारों का क्यों हो रहा है धंधा चौपट

    Mitti-ke-bartan

    देसी फ्रिज के नाम से मशहूर मिट्टी के मटके हुए आधुनिकता का शिकार

    (Earthen Ware)

    सच कहूँ/बिन्टू श्योराण नरवाना। गर्मी ने अपना जलवा दिखाना शुरु कर दिया है, जिसमें आमजन में पानी की जरुरत बढ़ रही है। मिट्टी के बर्तन बनाने वाले कुम्हार समाज के लोगों को भी पुश्तैनी काम बढ़ने की उम्मीद दिखाई देने लगती है लेकिन आधुनिकता की दौड़ में मिट्टी के बर्तन बनाने वालों का धंधा चौपट होकर रह गया है। कुम्हार समाज के लोगों ने बताया कि उनका परिवार पिछले काफी वर्षो से मिट्टी के बर्तन बनाकर गुजर-बसर करते आ रहे है।

    पहले बर्तनों के बदले 30-40 किलो तक गेहूं दिया जाता था 

    इन दिनों जहां उन्हें मिट्टी लाने के लिए भारी किल्लतों का सामना करना पड़ा रहा है वहीं भारी मुश्कि ल से तैयार इन बर्तनों को खरीदने वाले ग्राहक कम होते जा रहे है। प्रजापत रामधारी, सूरजभान, किताब सिंह ने बताया कि वह वर्षो से इस धंधे से जुड़े हुए है और अब वह पहले वाली बात नहीं रही कि जब उन्हे प्रत्येक घर से बर्तनों के बदले 30-40 किलो तक गेहूं दिया जाता था। किसी जमाने में देसी फ्रि ज के नाम से मशहूर हुए मिट्टी के मटके आजकल आधुनिकता का इतना शिकार हुए कि अपना अस्तित्व बचाने की लड़ाई लड़ रहे है।

    • गर्मियां शुरु होते ही मिट्टी से बने बर्तनों की डिमांड इतनी बढ़ जाती थी
    • की समाज के लोगों को दिन रात बर्तन बनाने के लिए काम करना पड़ता था लेकिन आज स्थिति विपरीत है।

    न कोई खरीददार मिल रहा है और ना मिट्टी के मटकों का केज रहा

    आधुनिकता के इस युग में बर्तन बनाने का धंधा मयूर जग, फ्रिज जैसी आइटमों ने ठप करके रख दिया है। पहले जहां बर्तन बनाने के लिए गर्मी शुरु होने से एक महीना पहले ही हमारे बर्तन बुक किए जाते थे लेकिन अब गर्मी का मौसम पूरे चरम पर होने पर भी हमारे बर्तनों को पूछने वाला कोई नहीं है।

    • अब इस मंदी के दौर के चलते प्रजापत समाज के लोग भी इस पुश्तैनी धंधे से मुंह मोड़ने लगे है।
    • चाहे कुछ भी हो मिट्टी के बर्तनों का शीतल पानी आज भी स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है।
    • मयूर जग, फ्रिज का पानी बीमारियों के सिवाय ओर कुछ भी लाभ देने योग्य नहीं है।

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