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    भरया रहवै भंडार

    मरयादा कुल की रखै, जाण नहीं दे आण।
    तीन रूप नारी धरै, माँ, बेट्टी अर भाण।।

    बिजली पाणी मेह की, हर देखै बाट।
    अनदात्ता भूक्खा मरै, दुनिया करती ठाट।।

    जाड्डो-पालो-घाम-लू, बल्हद-खेत अर क्यार।
    बीज-दराती-हल-कस्सी, सब किसान का यार।।

    ज्यूं जवान सै सीम पै, खेत्तां रह्वै किसान।
    मिलकै राक्खैं देस की, आन-बान अर स्यान।।

    नसा करै कोई भलै, इसमैं रोग हजार।
    घर तै, जग तै टूटकै, पावै कस्ट अपार।।

    जात्ती-पात्ती न कर्यो, सामाजिक बिखराव।
    समरसता कै मन्तर सै, मन तै मिटे मुटाव।।

    समझ सक्या ना मैं कदै, या जीवन की राह।
    आह कदे सै जिन्दगी, कदे जिन्दगी वाह।।

    ग़जब रूप धर लीडरां, फूल्या नहीं समाय।
    वादां की लै पोटली, जनता लयी पटाय।।

    भूल सै भी भूलां नहीं, सुणल्यो बात बिसेस।
    सदा सुदेसी ही रखां, भोजन, भासा, भेस।।

    साफ रखां हम रोजना, तन-मन अर संसार।
    सेहत-यस-धन-धान का, भरया रहवै भंडार।।

    मुकुट अग्रवाल ‘भावुक’, अंसल टाऊन, रेवाड़ी

     

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