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    अपने शिष्यों की हरदम करते संभाल पूज्य परम पिता जी

    Shah Satnam Singh Ji

    सरसा (सच कहूँ डेस्क)। एक बार गांव हुसनर जिला मुक्तसर साहिब में सत्संग का कार्यक्रम था और प्यारे मुर्शिद-ए-कामिल पूजनीय परम पिता शाह सतनाम सिंह जी महाराज ने प्रेमी गुरांदित्ता सिंह के घर पर अपने पावन चरण रखने थे क्योंकि परिवार जनों ने पूजनीय शहनशाह जी की पावन हजूरी में प्रार्थना करके पहले ही मंजूरी ले रखी थी। सत्संग के निश्चित दिन से एक दिन पहले प्रेमी का छोटा लड़का जलौर सिंह शाम के वक्त बच्चों के साथ खेल रहा था। जलौर सिंह अचानक ही तख्तपोश के ऊपर से नीचे गिर गया। नीचे एक खूंटा था जो जलौर सिंह के सिर में लग गया। सिर में से खून निकलने लगा। काफी गहरा जख्म हो गया। जिसमें से खून ही खून निकल रहा था। सारे परिवार ने कुल मालिक दयालु सच्चे सतगुरू जी के चरणों में विनती की, नारे लगाए तो खून रूक गया। डॉक्टर से पट्टी करवा ली गई।

    उसी रात गुरांदित्ता सिंह जी की पूरी तरह स्वस्थ भैंस जो कि बयाने वाली थी, खड़ी-खड़ी एकदम से नीचे गिर गई और उसी समय दम तोड़ गई। सारा परिवार हैरान और परेशान था कि यह क्या हो गया? सत्संग की खुशी की जगह परिवार को गम व परेशानी ने आ घेरा। एक ही दिन में दो दुर्घटनाएं हो गई, जो परिवार के लिए चिंता का कारण बन गई। अगले दिन प्रात: ही भैंस को उठवा दिया गया और घर की पूरी सफाई करवा दी गई। पूजनीय परम पिता जी प्रात: 9:00 बजे प्रेमी जी के घर पधारे। सारा परिवार तथा गांव की साध-संगत ने पूजनीय परम पिता जी का लाख-लाख धन्यवाद किया। गुरांदित्ता सिंह व गांव के कुछ प्रेमियों ने बहन चंद कौर (गुरांदित्ता सिंह की पत्नी) को कहा कि पूजनीय परम पिता जी के पास कोई अर्ज न करे और न ही लड़के की चोट और न ही भैंस के मरने के बारे में बात करे।

    जब बहन चंद कौर ने कुल मालिक पूजनीय परम पिता जी के आगे ‘‘धन-धन सतगुरू तेरा ही आसरा’’ का नारा लगाया तो अर्न्तयामी दातार जी ने फरमाया, ‘‘बेटा! बन्दे दे सिर वट्टे कालू नूं पशु दा सिर दित्ता चंगा कि बन्दे दा सिर दित्ता चंगा।’’ यह वचन सुनते ही सारे परिवार का मन शांत हो गया। सारे परिवार ने पूजनीय परम पिता जी का लाख-लाख शुक्राना किया। सारी साध-संगत खुशी में नारे लगा रही थी। इस प्रकार पूर्ण सतगुरू अपनी दया मेहर से जीवों के कर्म को सूली से सूल कर देते हैं, जिस तरह कि उपरोक्त करिश्में में हुआ है। सच्चे सतगुरू जी के उपकार का बदला तो जीव दे ही नहीं सकता।

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