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Saturday, February 28, 2026
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    बिना रक्तपात शीत युद्ध खत्म कराने वाले गोर्बाचोव नहीं रहे

    सोवियत संघ के थे अंतिम राष्ट्राध्यक्ष

    रूस के 15 देशों में विघटन के लिए माने जाते हैं जिम्मेदार

    मॉस्को (एजेंसी)। तत्कालीन सोवियत संघ के पूर्व राष्ट्रपति मिखाइल सेर्गीविच गोर्बाचोव का 91 वर्ष की आयु में निधन हो गया। मिखाइल गोर्बाचोव सोवियत संघ के अंतिम राष्ट्राध्यक्ष थे। हालांकि उनका कार्यकाल बहुत विवादों में रहा है। उन्हीं के कार्यकाल में सोवियत संघ का विघटन हुआ और वह 15 देशों में टूट गया। जोसेफ स्टालिन की नीतियों से हट कर उन्होंने शीत युद्ध को खत्म करने पर काम किया। उन्होंने ग्लासनोस्ट (खुलेपन) और पेरेस्त्रोइका (परिवर्तन) की अवधारणाओं को पेश किया। इसी कारण उन्हें पश्चिम में पसंद किया जाता है।
    गोर्बाचोव अपनी नीतियों को सोवियत संघ के संस्थापक व्लादिमीर लेनिन के सिद्धांतों की वापसी और खराब अर्थव्यवस्था को मानवीय तरीके से सुधारने का कदम मानते थे। 1985 में गोर्बाचोव सोवियत संघ के राष्ट्रपति बने। उन्होंने 1986 में सबसे पहले पेरेस्त्रोइका शब्द दिया। ये शब्द रूस के भीतर सुधार से जुड़े आंदोलन के लिए दिया गया था। इसका लक्ष्य कई मंत्रालयों से हट कर बाजार को स्वतंत्र करने की शुरूआत करना था। हालांकि माना ये भी जाता है कि इसी कारण सोवियत संघ टूटने की कगार पर पहुंच गया।

    कैसा रहा है गोर्बाचोव का जीवन

    मिखाइल का जन्म 2 मार्च 1931 को रूस के एक गाँव में हुआ था। उनके दादा और नाना दोनों गो ही ह्यग्रेट पर्जह्ण के दौरान कैद कर लिया गया था। ग्रेट पर्ज के दौरान स्टालिन सत्ता में आने के लिए काफी क्रूर हो गए थे, इस दौरान कई लोगों को जेल भेजा गया था। 15 साल की उम्र में वह कंबाइन मशीन से फसल काटने का काम करते थे। अपनी मेहनत से गोर्बाचोव को मॉस्को स्टेट यूनिवर्सिटी में कानून की पढ़ाई का मौका मिला, इसके साथ ही उन्हें कम्यूनिस्ट पार्टी का एक छोटा लाल आईडी कार्ड मिला। 1960 के बाद गोर्बाचोव पार्टी में एक शक्तिशाली नेता बनते गए। 1971 में गोर्बाचोव पार्टी की केंद्रीय कमेटी के सबसे युवा नेता थे। 1978 में वह अपनी बेटी और पत्नी राइसा के साथ मॉस्को चले गए।

    विदेश देख कर चौंक गए थे गोर्बाचोव

    सोवियत संघ में एक समय ऐसा था जब हर चीज पर सरकार का नियंत्रण होता था। जैसे अगर आपको चिप्स लेना है तो वह किसी सरकारी नियंत्रण वाली कंपनी से आया होगा, जिसने तय किया होगा कि आलू किससे लेना है, कैसे बनाना है और कैसे बेचना है कुल मिला कर लोगों के पास ज्यादा विकल्प नहीं होते थे। गोर्बाचोव को उनके पद के कारण कई देशों में जाने के मौका मिला, जहां खुली अर्थव्यवस्था देख कर वह हैरान रह गए। वहां लोगों के पास ढेर सारे विकल्प थे। जबकि सोवियत प्रोपोगेंडा उसे सड़ती पूंजीवादी व्यवस्था कहता था।

    सुधारों के थे पैरोकार

    मार्च 1985 में गोर्बाचोव सोवियत संघ के नेता बने। तब सोवियत संघ दुनिया की तीसरी सबसे ज्यादा आबादी वाला देश था और उसकी कुल सैन्य क्षमता 50 लाख थी। लेकिन उसकी अर्थव्यवस्था और कृषि के हालात मजबूत नहीं थे। टॉयलेट पेपर से लेकर महिलाओं के जूते और पर्स जैसी बुनियादी चीजों की कमी थी। एक समय जिस देश में खाने की कमी नहीं थी, उसे गेहूं निर्यात करना पड़ता था। गोर्बाचोव सुधारों को समझते थे। लेकिन उन्होंने जो सबसे पहला फैसला लिया वह था लोगों की शराब की आदत छुड़ाने के लिए उसकी कीमतों को बढ़ाना। इस फैसले से चमत्कारिक तौर पर देश में जन्म दर में वृद्धि हुई।

    पेरेस्त्रोइका क्या था

    साल 1986 में उन्होंने सोवियत अर्थव्यवस्था में सुधार की घोषणा के साथ पेरेस्त्रोइका शब्द दिया। इसके जरिए उन्होंने छोटे-छोटे व्यवसायों को अनुमति दी और मीडिया पर सेंसर को कम किया। इसके कारण टेलीविजन शो में चौंकाने वाली खोजी रिपोर्ट और पश्चिमी देशों की समृद्धि दिखने लगी। लोगों तक जिन चीजों की पहुंच नहीं थी, उन्हें टीवी ने उसके बारे में बताया। हालांकि उनकी आर्थिक नीतियां अनुमान के हिसाब से अच्छी साबित नहीं हुर्इं। सरकारी दुकानें बंद हो गर्इं और खुले बाजार में चीजें महंगी हो गर्इं। तेल की कीमतों में गिरावट ने भी अर्थव्यवस्था पर चोट की, जिसके कारण देश के अलग-अलग हिस्सों में तनाव बढ़ा।

    शीत युद्ध को खत्म किया

    सोवियत संघ के लिए भले ही मिखाइल बेहतर नहीं रहे, लेकिन उन्होंने दुनिया को परमाणु युद्ध से बचाने वाले फैसले किए। उन्होंने और अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन ने परमाणु हथियारों और मिसाइल की संख्या कम करने से जुड़े कई महत्वपूर्ण समझौते किए। 1988 में तो रोनाल्ड रीगन ने रेड स्क्वॉयर में एक भाषण के दौरान यह तक कह दिया था कि वह सोवियत संघ को एक दुष्ट साम्राज्य के रूप में नहीं देखते। 1990 में मिखाइल को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। इस पुरस्कार को देने वाली समिति ने कहा था कि उनके शासनकाल में पूर्व और पश्चिम के बीच संबंधों में नाटकीय बदलाव हुए हैं।

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