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    मिशन मुस्कुराहट…

    Dera Sacha Sauda: आईए समाज के एक और कोने में चलते हैं, जहां कुछ लोग अपने बेटे, पुत्रवधू, पौत्र-पौत्रियों से भरा परिवार होने के बावजूद घर में भी अकेलेपन व तिरस्कार का संताप झेलते हैं और फिर बच्चे उन्हीं माता-पिता को वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं फिर उनको मिलने तक नहीं जाते!, अगर मिलना ही होता तो बच्चे उनको वृद्ध आश्रम में क्यों छोड़कर आते ? यहां भी फरिश्ते ही पहुंचते हैं। कोई बाईक से उतरता है, तो कोई कार से। हाथ में फल-फ्रूट और खाने-पीने की अन्य सामग्री लिए ये फरिश्ते अनजान बुजुर्गों के पास इस तरह जाते हैं जैसे वे अपने माता पिता के पास ही आए हों। ये फरिश्ते खाने पीने का सामान छोड़ने नही आते, बल्कि अपनत्व की भावना व सत्कार लेकर पहुंचते हैं और उनसे बातें करते हैं, उनके साथ समय बिताते हैं। इन फरिश्तों से बात कर बुजुर्गों की तन्हाई पंख लगाकर उड़ जाती है। चेहरे पर मुस्कुराहट बिखरने लगती है। बातें कर बुजुर्गों को लगता है कि उनका असली परिवार पहुंच गया है। चेहरे से गम उड़ जाता है, खुशियां पक्का ठिकाना बना लेती हैं। इन फरिश्तों को पूज्य गुरु जी ने अपने मिशन मुस्कुराहट पर भेजा होता है।

    अअतीत की स्वर्णिम जीवनशैली से कटकर आधुनिक युग की तनावपूर्ण जिदगी में लोग ठहाके लगाकर हँसना तो दूर, मुस्कुराना भी भूल गए हैं। ऐसे माहौल में उदास चेहरों के लिए हँसी एक तोहफा या भगवान की अनमोल देन होती है। पूज्य गुरु जी साध-संगत को आत्मज्ञान देने के साथ-साथ, किसी-न-किसी रूप में हँसाकर, जीवन में हँसी की आवश्यक खुराक पूरी करते हैं। Dera Sacha Sauda

    आप जी फरमाते हैं कि अपने बच्चों (मानवता) को खुशियाँ देना और सभी को हँसता देखना ही हमारे जीवन का मुख्य उद्देश्य है। सामाजिक और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से एक पिता ही अपने बच्चों का सबसे बड़ा हितैषी होता है, जो उनकी उदासी पर चिंतित रहता है। पूज्य गुरु जी द्वारा मानवता को खुशी देने का दायरा अत्यंत विशाल है। रूहानियत का यह महान सत्य है कि पूर्ण सतगुरु जब हँसते हैं, तो रहमतों की बरसात होती है। लेकिन खुशियों की यह दौलत केवल साध-संगत तक सीमित नहीं है। पूज्य गुरु जी कैसे दुखी मानवता में खुशियाँ बाँटते हैं, इसकी कुछ मिसालें यहाँ प्रस्तुत हैं— आप जी का ध्यान समस्त सृष्टि पर है। आप जी उन चेहरों का भी ख्याल रखते हैं, जो अपने प्रियजनों से बिछुड़ने के कारण अत्यधिक दुखी हैं।

    वह माँ, जिसका लाडला 5-10 वर्षों से घर नहीं लौटा, उसे रोटी भी अच्छी नहीं लगती। उसका बेटा भूखा प्यासा किस हाल में होगा, यही सोचकर रोटी की कोर गले में अटक जाती है। पिता कुछ कहता नहीं, लेकिन अंदर से टूट जाता है। पूज्य गुरु जी के प्रयासों से ऐसे परिवारों में फिर से मुस्कान लौटती है, जब डेरा सच्चा सौदा के सेवादार सैकड़ों किलोमीटर दूर से बिछड़े व्यक्ति को उसके घर पहुँचा देते हैं। अपने जिगर के टुकड़े को गले लगाकर माँ-बाप की आंखों में खुशी के आँसू आते हैं और वहीं से मुस्कान व हँसी का सिलसिला शुरू हो जाता है। संगरूर, संगरिया, केसरी सिंहपुर, मलोट सहित अनेक ब्लॉकों के डेरा श्रद्धालु पूज्य गुरु जी की प्रेरणा से खुशियाँ बाँटने की इन्सानियत मुहिम में सेवा का सौभाग्य प्राप्त कर रहे हैं। सेवादार सैकड़ों गुमशुदा व्यक्तियों की देखभाल करते हैं, इलाज करवाते हैं, नहलाते हैं, कपड़े देते हैं, भोजन-पानी उपलब्ध कराते हैं—यह दृश्य तो जैसे सतयुग का प्रतीक है।

    भोजन के बिना कौन खुश रह सकता है? फिर यदि कोई बुजुर्ग, अकेला रह रहा हो या अपंग हो, तो सेवादार जब घर-घर जाकर महीने भर का राशन देते हैं, तो चेहरे पर खुशी आना तय है। दूसरों की खुशी में अपनी खुशी—यही है पूज्य गुरु जी का खुशियाँ बाँटने का मिशन। अन्न से भरे भंडार में यदि कोई भूखा सो जाए, तो यह मानवता के विरुद्ध है। इसी तरह जब मौत के मुँह में पड़ा मरीज रक्त के अभाव में निराश हो जाता है तो चेहरे से रंग उड़ जाते हैं। ऐसे समय में कोई डेरा श्रद्धालु दौड़कर रक्तदान करता है तो किसी की जान बचाने का सुकून पाकर स्वयं सेवादार भी प्रसन्न हो उठता है, और मरीज व उसके परिवार में खुशियों की बहार छा जाती है। सड़क पर आम देखा जाता है कि हादसे में तड़प रहे घायल मौत के डर से और भी व्याकुल हो जाते हैं, जब लोग उनके पास से तेज रफ़्तार में गुजर जाते हैं और कोई मदद नहीं करता।

    ऐसे में फरिश्ते आते हैं, पर वे आसमान से नहीं उतरते, बल्कि आम इंसानों की भीड़ से ही निकलते हैं और बिना देर किए घायल को उठाकर अस्पताल पहुँचा देते हैं। समय पर इलाज मिलने से घायल जीवन की जंग जीत जाते हैं और उनके परिवार के चेहरों पर अनुपम खुशी के भाव साफ नज़र आते हैं। आईए समाज के एक और कोने में चलते हैं, जहां कुछ लोग अपने बेटे, पुत्रवधू, पौत्र-पौत्रियों से भरा परिवार होने के बावजूद घर में भी अकेलेपन व तिरस्कार का संताप झेलते हैं और फिर बच्चे उन्हीं माता-पिता को वृद्ध आश्रम में छोड़ आते हैं फिर उनको मिलने तक नहीं जाते!, अगर मिलना ही होता तो बच्चे उनको वृद्ध आश्रम में क्यों छोड़कर आते ? यहां भी फरिश्ते ही पहुंचते हैं। कोई बाईक से उतरता है, तो कोई कार से। हाथ में फल-फ्रूट और खाने-पीने की अन्य सामग्री लिए ये फरिश्ते अनजान बुजुर्गों के पास इस तरह जाते हैं जैसे वे अपने माता पिता के पास ही आए हों। Dera Sacha Sauda

    ये फरिश्ते खाने पीने का सामान छोड़ने नही आते, बल्कि अपनत्व की भावना व सत्कार लेकर पहुंचते हैं और उनसे बातें करते हैं, उनके साथ समय बिताते हैं। इन फरिश्तों से बात कर बुजुर्गों की तन्हाई पंख लगाकर उड़ जाती है। चेहरे पर मुस्कुराहट बिखरने लगती है। बातें कर बुजुर्गों को लगता है कि उनका असली परिवार पहुंच गया है। चेहरे से गम उड़ जाता है, खुशियां पक्का ठिकाना बना लेती हैं।
    इन फरिश्तों को पूज्य गुरु जी ने अपने मिशन मुस्कुराहट पर भेजा होता है। -संपादक

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