
ममता ने 80 महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ा, चांदनी हॉकी में राष्ट्रीय स्तर तक पहुंची
International Women’s Day: खारियां (सच कहूँ/सुनील कुमार)। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर जिले के गांवों से निकली तीन ऐसी महिलाओं की कहानियां सच कहूँ सामने लेकर आया हैं, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद अपने हौसले और मेहनत से नई पहचान बनाई। गांव चक्कां की ममता इन्सां, बालासर की हॉकी खिलाड़ी चांदनी सेन और चक्कां की बहू डॉ. प्रियंका इन्सां आज अपने-अपने क्षेत्र में मिसाल बनकर उभरी हैं। किसी ने महिलाओं को स्वावलंबी बनाया, किसी ने खेल के मैदान में संघर्ष से सफलता पाई और किसी ने शिक्षा के क्षेत्र में नई ऊंचाई हासिल की। सच कहूँ ऐसी मेहनती और हौसलेमंद महिलाओं के जज्बे, जोश और जुनून को सलाम करता है, जो सीमित संसाधनों के बावजूद अपने दम पर नई पहचान बनाकर समाज के लिए प्रेरणा बन रही हैं। Sirsa News
12वीं पास ममता बनीं 80 महिलाओं के रोजगार की राह
गांव चक्कां की बहू ममता इन्सां ने साबित कर दिया कि मजबूत इरादों के सामने शिक्षा या संसाधनों की कमी बाधा नहीं बनती। मात्र 12वीं पास ममता ने हरियाणा राज्य आजीविका मिशन से जुड़कर गांव में स्वयं सहायता समूहों की शुरूआत की। अगस्त 2019 में उन्होंने 10 महिलाओं के साथ एक छोटा समूह बनाया, जो हर महीने सिर्फ 10 रुपये बैंक में जमा करता था। धीरे-धीरे यह पहल बढ़ती गई और आज गांव में 8 स्वयं सहायता समूह सक्रिय हैं, जिनसे करीब 80 महिलाओं को रोजगार मिला है। इन समूहों से जुड़ी महिलाएं चूड़ियां, साबुन-सर्फ बनाना, मनियारी व किरयाणा की दुकान चलाना, कपड़ों का व्यापार, खेती-पशुपालन, डेयरी, कढ़ाई-बुनाई और ब्यूटी पार्लर जैसे काम कर रही हैं।
इससे हर महिला को औसतन करीब 15 हजार रुपये मासिक आय हो रही है। ममता जल संरक्षण, पर्यावरण, स्वच्छता, नशा मुक्ति, बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ और दहेज प्रथा के खिलाफ भी गांव में जागरूकता अभियान चलाती रही हैं। उनके नेतृत्व में अब तक करीब 2800 पौधे वितरित और 1000 पौधे रोपित किए जा चुके हैं, साथ ही कई सामाजिक कार्यक्रम भी आयोजित किए गए हैं। उनके उत्कृष्ट कार्यों के लिए उन्हें ग्राम पंचायत से लेकर खंड, जिला और राज्य स्तर तक सम्मान मिला है। वर्ष 2024 में दिल्ली में आयोजित कैच द रेन अभियान के तहत गृह मंत्रालय भारत सरकार द्वारा भी सम्मानित किया गया। वहीं 26 जनवरी 2025 को लखपति दीदी योजना के तहत गणतंत्र दिवस परेड की झांकी में नेतृत्व करने का अवसर भी मिला। Sirsa News
संघर्षों से लड़कर हॉकी में चमकी बालासर की चांदनी
गांव बालासर की चांदनी सेन ने आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद हॉकी के मैदान में अपनी अलग पहचान बनाई है। उनके पिता शारीरिक रूप से दिव्यांग हैं और परिवार की आर्थिक स्थिति भी कमजोर रही, लेकिन चांदनी ने हार नहीं मानी। उन्होंने वर्ष 2018 में कक्षा आठवीं के दौरान हॉकी खेलना शुरू किया। शुरूआती दौर में परिवार ने लड़की होने के कारण बाहर खेलने भेजने से मना कर दिया, लेकिन चांदनी ने अपने सपनों को जिंदा रखा। बाद में परिवार के समर्थन से उन्होंने खंड, जिला और राज्य स्तर की प्रतियोगिताओं में शानदार प्रदर्शन किया।
नेपाल में आयोजित अंतरराष्ट्रीय हॉकी प्रतियोगिता में भी उन्होंने सिल्वर मेडल हासिल कर देश का नाम रोशन किया। आज चांदनी राजीव गांधी खेल स्टेडियम बालासर में सीनियर नेशनल टूर्नामेंट की तैयारी कर रही हैं। साथ ही आसपास के चार-पांच गांवों की करीब 30 लड़कियों को हॉकी की ट्रेनिंग भी दे रही हैं। खास बात यह है कि खेल की तैयारी के लिए उन्होंने बच्चों को ट्यूशन पढ़ाकर अपने खर्च पूरे किए। उनका सपना है कि ओलंपिक में भारत को गोल्ड मेडल दिलाएं और भविष्य में सरकारी कोच बनकर युवाओं को खेलों की ओर प्रेरित करें।
पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच प्रियंका ने हासिल की पीएचडी | Sirsa News
गांव चक्कां की बहू और गोरीवाला की बेटी डॉ. प्रियंका इन्सां ने भी शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों के साथ-साथ पढ़ाई जारी रखते हुए फिजिक्स विषय में पीएचडी पूरी की। प्रियंका ने पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला से एमएससी करने के बाद राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा भी पास की। इसके बाद उन्होंने एसकेडी कॉलेज हनुमानगढ़ से कंसंट्रेटेड सोलर पावर टेक्नोलॉजी विषय पर शोध कर डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की।
वर्तमान में वह दमदमा स्थित एक निजी स्कूल में प्राचार्य के पद पर कार्यरत हैं। उनके तीन स्कोपस शोध पत्र और एक पुस्तक भी प्रकाशित हो चुकी है। शादी, बेटी के जन्म और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच पढ़ाई जारी रखना आसान नहीं था। वर्ष 2023 में पिता के आकस्मिक निधन से भी उन्हें मानसिक आघात लगा, लेकिन परिवार के सहयोग और अपने संकल्प से उन्होंने लक्ष्य हासिल किया। आज डॉ. प्रियंका इन्सां गांव चक्कां की चौथी पीएचडी होल्डर बनकर क्षेत्र के युवाओं के लिए प्रेरणा बन गई हैं।
प्रेरणा बन रहीं गांव की बेटियां
इन तीनों महिलाओं की कहानी बताती है कि अगर हौसले मजबूत हों तो सीमित संसाधन भी सफलता की राह में बाधा नहीं बनते। सामाजिक कार्य, खेल और शिक्षा तीनों क्षेत्रों में इन बेटियों ने न केवल अपनी पहचान बनाई, बल्कि समाज की अन्य महिलाओं और युवाओं के लिए भी प्रेरणा का स्रोत बन गई हैं। Sirsa News














