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Monday, March 30, 2026
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    अकबर इलाहाबादी शायरी

    बस जान गया मैं तिरी पहचान यही है
    तू दिल में तो आता है समझ में नहीं आता

    ख़ुदा से माँग जो कुछ माँगना है ऐ ‘अकबर’
    यही वो दर है कि ज़िल्लत नहीं सवाल के बाद

    जब मैं कहता हूँ कि या अल्लाह मेरा हाल देख
    हुक्म होता है कि अपना नामा-ए-आमाल देख

    अकबर इलाहाबादी

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