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    विकास के दिमाग में ये कैसा भूत

    Bhay Ka Bhoot
    भय का भूत

    Bhay Ka Bhoot Story: कुछ दिनों से विकास अपने में ही खोया सा नजर आ रहा था। न वह बाहर खेलने जाता था, न किसी से ज्यादा बोलता था, न शरारत, न उद्दंडता। यूँ कहे तो एक तपस्वी की भाँति विचारवान सा नजर आता था। आज भी वह विद्यालय से आया और बैग रखकर गुमसुम बैठ गया। डरा सा, सहमा सा। न जाने क्या उसके दिमाग में चल रहा था जिसका आभास ही इतना कि वो पहले से अस्वस्थ लग रहा था।

    ‘‘अरे चल खाना खा ले और चला जा बाहर अपने दोस्तों के संग खेलने घंटा दो घंटा।’’-मेसर ने खाना परोसते समय अपने बेटे को स्नेहमयी वाणी से कहा विकास उठा और एक रोटी आधे घंटे में खाकर बाहर खेलने चला गया। उसके बाहर जाने पर मेसर ने किरण से कहा-‘‘जाकर देख तो जरा वह खेल भी रहा है या उसी लटके मुँह से किसी कोने में बैठा है।’’

    किरण ने देखा कि वह बड़े मजे में तल्लीन भाव से खेल रहा था। मित्रों के साथ ऐसा मन रमाए क्रीड़ा में लीन था जैसे वह कोई चोटी का खिलाड़ी हो। दो घंटे की छुट्टी उसे याद ही नहीं। वह तो सायं सूरज ढले ही घर लौटा परन्तु घर में आकर फिर वहीं मुद्रा। न बोलना, न शरारत, न उद्दंडता, किसी 9 वर्ष के बच्चे की भाँति। Bhay Ka Bhoot Story

    ‘‘लड़के को क्या हो गया कुछ समझ में नहीं आता। सभी आस-पड़ोस व परिवार वाले उसकी मौन मुद्रा से चिंतित थे। अच्छा-खासा तो शोर मचाता था मुहल्ले भर में। न जाने अब क्या सूझा, किसकी नजर लगी जो नौ वर्ष में ही मौनी साधू सा बन गया है। पाँच-छह दिन पहले तो पीटने पर भी नहीं शांत बैठता था और अब कहने पर भी हलचल नहीं करता।’’-मेसर मनो मन सोच रही थी।

    वह अपनी माँ के साथ बाहर गली में बैठा रहता था। जब पड़ोसिनें मेसर के संग वार्तालाप में लीन हो जाती तो वह माँ के पीछे शांत भाव से बैठ अपलक उनकी ओर ध्यानमग्न देखता रहता और उनकी बातें बड़े गौर से सुनता रहता। ‘‘पता नहीं क्या बला थी, मोनू की माँ चाहे तो बर्तन माँझ रही थी और एक ही पल में चकरी खाकर धरती पर गिर पड़ी, बाल बिखर गए, न कपड़ों की सुध, न तन की। गर्दन को 5 मिनट तक ऐसे इधर-उधर घुमाती रही मानों चाबी लगा खिलौना। उसका घरवाला उसे ओझा के घर ले गया। तब जाकर कुछ शांत हुई और अचेत रूप में बोलती रही। मैं फूलपति, मैं लीला और मैं

    सरोज………………….। भूत-प्रेत का साया भी बड़ा बुरा होता है बहन जी’’-पड़ोसिन लाजो अभिनय रूप में बोली ‘‘हाँ री मैंने भी एक दिन रात को राहुल के पापा से सुना, जब वो शनिवार को ड्यूटी से घर आ रहे थे तो उसे रेल के फाटक पर एक अजीब सी परछाई के दर्शन हुए, न उसके सिर, न पैर। वे भूत-मंत्र ही भूल गए और जरा सी हवा की आहट भी डराने लगी। बड़ी मुश्किल से घर का दरवाजा लिया। राम बचाए इन भूत-प्रेत, जिन-चुड़ैलों से। में तब से किसी को मुँह अंधेरे घर से बाहर ही नहीं निकलने देती।’’- दूसरी पड़ोसिन ने भी उत्साहित भावों से कहा ‘‘अरी बहनों, एक दिन महेश को उसके बाप की चाय देकर बेर के बाग में भेज दिया। शिखर दोपहरी थी, यही कोई एक बजे। Bhay Ka Bhoot Story

    वहाँ समीप मैदान में खेलते बालकों ने उसे बाग में अकेला जाने से मना कर दिया और उन्होंने कहा कि बाग के कोने में एक दौलपोश रहता है। जो भी उस रास्ते से रात व दोपहर बारह-एक बजे गुजरता है उसका रास्ता रोक लेता है, फिर उसे ताप-सर्दी का जबरदस्त बुखार। बड़ा तगड़ा भूत-पिशाच है। मजबूरी में लड़का भूत का भय खाता बाग में तो चला गया लेकिन आते समय बच्चे भी मैदान से सफ थे। लड़का घर तो पहुँच गया लेकिन ताप-सर्दी व दौलपेश का साया लिए। दस दिन तक बुखार में पड़ा रहा, तब कहीं जाकर ठीक हुआ।’’-तीसरी पड़ोसिन ने भी अपनी कथा बाँची विकास चुपचाप उनकी भाव भंगिमायुक्त बातों को गौर से सुन रहा था। मेसर व उसकी तीनों पड़ोसिनों को बैठे चार घंटे के करीब हो चुके थे परंतु विकास उनकी ओर ऐसे ध्यान लगाए बैठा था जैसे सीमा पर सैनिक या कक्षा में होनहार छात्र। उनको एक बार भी यह नहीं लगा कि पीछे एक नौ वर्ष का बालक भी है। रसलीन इतनी, न समय की पाबंदी, न घर का ख्याल।

    ‘‘अरी मेसर, तुम्हारे घर में कोई आया है। देख दरवाजे पर खड़ा हाथ-पैर मार रहा है।’’-एक पड़ोसिन ने मेसर की ओर संकेत करते हुए कहा।

    ‘‘बहना, ये तो विकास के पापा हैं, ड्यूटी से आ रहे हैं। इतना समय राम-राम, आज तो खैर नहीं।’’-मेसर ने उठते हुए कहा

    ‘‘अरी बैठ भी जा कुछ पल और, उन्हें भी तो पता चले कि हम भी कोई हैं।’’-दूसरी पड़ोसिन ने मस्त भाव से कहा

    ‘‘ना बहन जी, सूरज भी ढल गया है, खाना-पकाना भी………’’-मेसर विकास का हाथ पकड़कर ले जाते हुए बोली

    घर जाकर मेसर खाना बनाने में व्यस्त हो गई और दलीप बाबू स्नानादि में। विकास आँगन में गुमसुम सा बैठा रहा। किरण अपनी पढ़ाई में लीन। किसी का भी ध्यान भंग नहीं था। सभी अपने-अपने कार्यों में मग्न थे। सभी शारीरिक परिश्रम कर रहे थे परंतु विकास तो मानसिक परिश्रम पर ही अधिक जोर दे रहा था। वह सहमा व डरा हुआ था। आँगन में चुप्पी ऐसी कि सुई के गिरने की भी आवाज सुनाई पड़े।

    ‘‘आओ जी खाना तैयार है, किरण तुम भी खाना खा लो।’’-मेसर ने खाना परोसते हुए कहा।

    ‘‘अरे विकास, आओ भाई, जल्दी करो, तुम क्यों उदास बैठे हो।’’-दलीप बाबू ने मधुरता भरे शब्दों में कहा दलीप बाबू, मेसर व किरण जब सभी खाने के लिए बैठ गए तब भी विकास सोफे पर ही बैठा अपलक विचारों में उलण रहा। उसने मानों किसी की भी आवाज नहीं सुनी। मेसर उठी और उसका हाथ पकड़कर लाई व बड़े प्यार-दुलार से खाना खिलाने लगी। मातृरस में डूबे विकास ने तीन रोटियां कब खाई उसे पता भी नहीं चला। खाना खाकर सभी अपने-अपने कमरों में चले गए। किरण स्टडीरूम में तो दलीप बाबू बैडरूम में, मेसर रसोई घर में बर्तन साफ करने में मशगूल हो गई व विकास भी बैडरूम में अपनी अलग चारपाई पर लेट गया। रात्रि के साढ़े नौ बज चुके थे। सभी नींद की आगोश में जाने के उत्सुक थे। बत्ती बुझा दी गई थी। ठीक आधे घंटे के अंतराल पर विकास ने बत्ती जला दी। Bhay Ka Bhoot Story

    ‘‘अरे विकास, तुझे नींद नहीं आ रही क्या? क्यों बत्ती जलाई?’’-दलीप बाबू ने पूछा

    विकास चुपचाप अपनी चारपाई पर बैठ गया, वहीं मुद्रा, वही सोच। दलीप बाबू उठे और विकास को प्रेमपूर्वक समझाकर पुन: लेट गए। कुछ समय पश्चात् विकास की उच्छवास में सीटी सी बजती दलीप बाबू को महसूस हुई। उसने उठकर बत्ती जलाई और विकास को देखा। वह अब भी आँखें खोले लंबी-लंबी साँसें ले रहा था। दलीप बाबू ने उसे अपनी गोद में उठाया और अपने बिस्तर पर लेटा लिया।

    ‘‘पापा, क्या रात व दिन के बारह-एक बजे भी भूत दिखते हैं।’’-विकास ने अबोध वाणी में कहा

    ‘‘अरे नहीं बेटा, ऐसा कुछ नहीं होता, तू सो जा अब।’’-दलीप बाबू ने उसे स्नेहिल वाणी में कहा

    कुछ समय बाद दलीप बाबू ने देखा तब भी विकास खुली आँखों से विचारों की झील में गोते खा रहा था। दलीप बाबू को यह समझ नहीं आ रहा था कि इस लड़के को क्या हो गया है? यह तो अच्छा-भला शोर मचाने वाला तथा उच्छ शृंखल था और अब चुपचाप, डरा-सा। उसने विकास को अपने पास से उठाकर अपनी छाती पर लेटा लिया। बच्चे को थोड़ा चैन मिला लेकिन फिर भी सो नहीं पाया।

    ‘‘पापा, क्या अब रोशनी में भी भूत-प्रेत आ जाते हैं।’’-विकास ने कहा

    ‘‘अरे भाई, ऐसा कुछ नहीं होता, सो जा तू।’’-दलीप बाबू ने प्यार से कहा

    ‘‘भूत को देखकर ताप सर्दी क्यों लगती है? क्यों होता है बुखार? बाल क्यों बिखर जाते हैं? क्यों गर्दन इधर-उधर मारते हैं? क्या बहुत मारते हैं भूत?’’-विकास ने सहमी-सी वाणी में कहा

    ‘‘कौन कह रहा था तुझे ये सब बातें’’ कह तो दिया ऐसा कुछ नहीं होता। ये सब कमजोर और बीमारों की बातें हैं बेटा’’-दलीप बाबू ने विकास की पीठ पर प्रेमपूर्वक हाथ फेरते हुए कहा

    ‘‘सभी तो कह रही थीं, मोनू की ताई, लाजो-चाची, महेश की माँ और माँ भी तो कह रही थीं, इतने झूठ थोड़े ही कहते हैं।’’

    ‘‘भूत तो भय से बनता है मेरे बहादुर बेटा। भूत-वूत कुछ नहीं होता। भूत तो भयसे बनता है और भय हमेशा कमजोर और बीमारों को लगता है। बहादुर तो भय के भूत को जूत मारकर भगा देते हैं और तू बता बहादुर है या कमजोर?’’-दलीप बाबू ने उत्साहित वाणी में समझाते हुए पूछा

    ‘‘तो…………बहादुर……के पास………भूत……..नहीं……..आते।’’-विकास ने आश्चर्यचकित भाव से कहा
    मेसर ने अपनी कई दिनों से जमती महफिल पर पड़े-पड़े सोचा कि इस लड़के की चुप्पी और शांतचित्त रहने का ये राज था। हमारी ही बातों ने इसे इस अवस्था में लाकर खड़ा किया है-‘‘हे भगवान! मैं आर्इंदा ऐसा नहीं करूँगी।’’
    पापा के समझाने से विकास का हौंसला बढ़ा और वह बहादुरी की ढाल का कवच पहने सो गया। दलीप व मेसर भी अपने बच्चे के साथ नींद में शरीक हो गए तथा किरण पहले ही पढ़कर सो चुकी थी।

    प्रात: प्रफुल्लित उठे। पक्षियों का चहचहाना, मंद व शीतल पवन की शीतलता विकास को भी रोमांचित करने में सफल हुए। स्नानादि करने के पश्चात सभी ने प्रेमपूर्वक भोजन किया और समय पर स्कूल जाने हेतू तैयारी की। इतने में मोनू की ताई भागती हुई आई और जोर-जोर से दरवाजे को खटखटाने लगी। Bhay Ka Bhoot Story

    ‘‘कौन है?’’-मेसर ने अंदर से पुकारा ‘‘मैं पड़ोसिन हंू, मोनी की ताई।’’-उसने उत्तर दिया
    मेसर ने दरवाजा खोला तो उसने कहा-‘‘चल बहना, दिखाती हूँ, मोनू की माँ में भूतों की बातें।’’
    उसके साथ दलीप व मेसर चले गए तथा पीछे-पीछे विकास भी हो लिया। मोनू की माँ को मर्द की वाणी में बोलते हुए देख विकास ने कुछ सोचा और चुपचाप अपने घर आ गया। थोड़ी देर के पश्चात उसके माता-पिता भी आ गए, जो उसकी मानसिक व्याधि पर बातें कर रहे थे।

    ‘‘पापा, आदमी कोई भूत थोड़े होता है।’’-विकास ने आश्चर्य से कहा
    ‘‘अरे बहादुर बेटा, भूत होता ही नहीं। यह तो भय का भूत है।’’- विकास भी पापा की आवाज में टेक मिलाकर बोला
    तत्पश्चात् उसने बैग उठाया और किरण संग स्कूल की राह चल दिया।

    कुबलराज ‘स्नेही’

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