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    न्यूज चैनलों की नाटकीय बहसें खतरनाक

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    Supreme Court: महिलाओं की सुरक्षा को लेकर सुप्रीम कोर्ट गंभीर

    सुप्रीम कोर्ट ने इलैक्ट्रोनिक मीडिया पर होने वाली बहस के लिए ‘हेट स्पीच’ शब्द का प्रयोग कर मीडिया की भूमिका पर सवाल खड़े किए हैं। चीफ जस्टिस ने कठोरता से टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘नफरत से टीआरपी आती है व टीआरपी से मुनाफा आता है।’ माननीय न्यायालय ने यह भी कहा कि केंद्र सरकार ने इस मामले की तरफ कोई गौर नहीं किया। न्यायालय ने कहा कि वह (न्यायालय) इस संबंधी संशोधन जारी करना चाहती है, जो सरकार के कानून बनाने तक जारी रहें। न्यायालय की उक्त टिप्पणी मीडिया के लिए काफी नामोशी भरी है। अब तो मीडिया को जरूर जाग जाना चाहिए व मीडिया की शान बहाल करने के लिए कोई लक्ष्मण रेखा को मान लेनी चाहिए। दो दशकों से मीडिया में बहस केवल एक फैशन बनकर रह गई है व गर्मागर्म बहस को ही पत्रकारिता का स्तर समझा जाने लगा है। बहस करवाने वाले (एंकर) इस तरह ताना-बाना बुनते हैं कि बहस करने वाले अपनी बात रखने की बजाए चिल्लाते व झगड़ते नजर आते हैं।

    टीवी चैनलों द्वारा एक दूसरे की देखादेखी करवाई जाने वाली ये बहसें दर्शकों के दिलों में नफरत के बीज बो रही हैं। इन बहसों ने देशवासियों को बांटकर रख दिया है। एक देश में रहकर विभिन्न वर्गों के लोग खुद को एक दूसरे के विरोधी व भेदभाव के नजरिए से देखने लगे हैं। टीवी चैनलों पर होने वाली इस प्रकार की बहसें देश में सांप्रदायिकता व भेदभाव को बढ़ा रही हैं। यही नहीं, सांप्रदायिक बहस करने के लिए भी अलग-अलग वक्ता तय हुए हैं। राजनीतिक पार्टियों के नेता भी इन बहसों के माध्यम से अपने वोट बैंक के लिए ऊंची आवाज में चिल्लाते हैं। ऐसे जहरीले प्रचार का खमियाजा देश बुरी तरह झेल रहा है। सुप्रीम कोर्ट को एक टीवी चैनल के एक प्रोग्राम पर पाबंदी भी लगानी पड़ी। केंद्रीय प्रसारण मंत्री अनुराग ठाकुर भी तीखी बहस वाले टीवी चैनलों को मीडिया के लिए खतरा करार दे चुके हैं।

    हालांकि केबल टेलीविजन नेटवर्क के तहत यह नियम है कि समाज को धर्मों के आधार पर बांटने की कोई बात न की जाए। लेकिन यह नियम सही रूप से लागू होता नजर नहीं आ रहा। टीवी चैनल मनमानी करते हुए बहुत आगे निकल गए हैं। मीडिया संगठन भी दावा करते हैं कि वह मीडिया की नैतिकता संबंधी नियम बनाएंगे लेकिन ऐसे संगठन कोई ज्यादा असर नहीं दिखा सके। सरकारें चिंता तो व्यक्त करती हैं लेकिन किसी दिशा-निर्देश को लागू करने के लिए कोई प्रयास सामने नहीं आ रहे। सरकार को मीडिया की स्वतंत्रता बरकरार रखते हुए नफरत को रोकने के लिए दिशा-निर्देश लागू करने चाहिए। बेहतर हो, यदि मीडिया संस्थाएं पत्रकारिता के पवित्र पेशे को नैतिक तौर पर स्वीकार करते हुए नेक नीयत से बहस या तर्क करें।

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