extinction of village traditions

पींग रही न पींगणिए, न रहे पिलखण के पेड़

अब बीते जमाने की बात हुई सावन की वो झूलों वाली रौनक, नहीं सुनाई देते सावन के वो गीत | village traditions घरों व बाग-बगाचोंं में नहीं दिखाई देती वो गाती-इठलाती महिलाओं की टोलियां कुरुक्षेत्र सच कहूँ/देवीलाल बारना। दे दे री मेरी माँ पीढ़ी अर रैस, झूलण जांगी हरियल बाग मैं…, इस प्रकार के गीत […]
हरियाणा