Akash Dahiya: आकाश दहिया के ब्रोच ने खींचा ध्यान, ‘चंद्रावल’ की यादों से ‘फुलन’ तक का सफर किया बयां
आकाश दहिया के ब्रोच ने खींचा ध्यान, ‘चंद्रावल’ की यादों से ‘फुलन’ तक का सफर किया बयां
Akash Dahiya: ‘चंद्रावल’ की याद से ‘फुलन’ तक, अभिनेता व कास्टिंग डायरेक्टर आकाश दहिया ने ब्रोच में समेटी अपनी सिनेमाई कहानी, खींचा सबका ध्यान- हरियाणा से जुड़ाव रखने वाले अभिनेता आकाश दहिया ने बॉलीवुड फिल्मों, कास्टिंग और ओटीटी की दुनिया में बनाई पहचान; भगत सिंह पर आधारित शॉर्ट फिल्म ‘द लास्ट मील’ में भी निभाई अहम भूमिका
एक सूट, उसकी जेब पर लगा एक छोटा-सा ब्रोच और उससे जुड़ी एक बड़ी कहानी। हरियाणा के सोनीपत से संबंध रखने वाले अभिनेता आकाश दहिया इन दिनों अपनी फिल्म ‘फुलन’ के प्रमोशन के दौरान पहने गए एक खास ब्रोच को लेकर चर्चा में हैं। प्रमोशनल कार्यक्रम में उन्होंने जो सूट पहना था, उसकी जेब पर लगे ब्रोच पर ‘फुलान’ और ‘चंद्रावल’ दोनों फिल्मों के नाम लिखे थे। देखने में यह एक छोटा-सा ब्रोच भले ही एक सामान्य फैशन एक्सेसरी लगे, लेकिन इसके पीछे अभिनेता की फिल्मों से जुड़ी भावनाएं और उनकी सिनेमाई यात्रा की कहानी छिपी थी।
प्रमोशनल कार्यक्रम के दौरान हुई बातचीत में आकाश दहिया ने इस ब्रोच के पीछे की वजह बताई। उन्होंने कहा कि ‘चंद्रावल’ और ‘फुलन’ दोनों फिल्में उनके दिल के बेहद करीब हैं। उन्होंने सबसे पहले ‘चंद्रावल’ फिल्म देखी थी। इसके बाद बीच के वर्षों में कई फिल्मों के साथ उनका सफर आगे बढ़ा और अब वह ‘फुलन’ तक पहुंचे हैं। ऐसे में दोनों फिल्मों के नाम वाला ब्रोच उनके लिए ‘चंद्रावल’ से ‘फुलन’ तक की यात्रा को दर्शाता है। आकाश के इस अंदाज ने एक दिलचस्प सवाल भी खड़ा किया कि आखिर किसी कलाकार के लिए एक फिल्म इतनी खास क्यों हो जाती है कि वह उसे अपने पहनावे का हिस्सा बना ले? उनके बताए अनुभव से यही समझ आता है कि सिनेमा से जुड़ी कुछ यादें समय के साथ धुंधली नहीं पड़तीं, बल्कि कलाकार के सफर का हिस्सा बन जाती हैं।
‘चंद्रावल’ से जुड़ी यादें, ‘फुलान’ के साथ नया पड़ावहरियाणवी सिनेमा की बात हो और ‘चंद्रावल’ का जिक्र न आए, ऐसा संभव नहीं है। वर्ष 1984 में रिलीज हुई यह फिल्म हरियाणवी सिनेमा की सबसे चर्चित और सफल फिल्मों में गिनी जाती है। जयंत प्रभाकर के निर्देशन और उषा शर्मा के निर्माण से जुड़ी इस फिल्म ने हरियाणवी भाषा की फिल्मों को व्यापक पहचान दिलाई। फिल्म में सूरज और चंद्रावल की प्रेम कहानी के साथ सामाजिक रूढ़ियों और जातिगत बंधनों को भी दिखाया गया था।
इसके गीत आज भी हरियाणा की लोक-सांस्कृतिक पहचान का हिस्सा हैं। आकाश दहिया के लिए इस फिल्म की अहमियत उनकी अपनी यादों से जुड़ी है। उनके मुताबिक, उन्होंने सबसे पहले ‘चंद्रावल’ देखी थी। इसके बाद कई फिल्मों में काम करते हुए उनका सफर आगे बढ़ा। अब ‘फुलन’ के प्रमोशन के दौरान दोनों फिल्मों के नाम वाला ब्रोच पहनना उनके लिए बीते समय से लेकर मौजूदा दौर तक की यात्रा को एक साथ दिखाने जैसा था। फूलन फिल्म का निर्देशन मशहूर निर्देशक रिची मेहता ने किया है, और इसे प्रतिष्ठित टोरंटो अंतर्राष्ट्रीय फिल्म महोत्सव (TIFF 2026) में भी प्रदर्शित किया गया है. यह फिल्म भारत की सबसे प्रसिद्ध महिला डकैत फूलन देवी के जीवन के 48 घंटों के एक तनावपूर्ण गतिरोध पर आधारित है।
सोनीपत से जुड़ाव, अभिनय का सपना और थिएटर से शुरुआतआकाश दहिया का जन्म दिल्ली में हुआ और उनका पारिवारिक जुड़ाव हरियाणा के सोनीपत से है। वह अभिनेता होने के साथ-साथ कास्टिंग के क्षेत्र में भी काम कर चुके हैं। आकाश की अभिनय में दिलचस्पी बचपन से ही थी। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि उनके परिवार में अभिनय के प्रति लगाव की एक पुरानी कहानी रही है। उनके दादा ने परिवार के लिए एक वीडियो कैसेट छोड़ी थी, जिसमें उनके पिता और चाचा अलग-अलग फिल्मी अंदाज में संवाद बोलते नजर आते थे। उनके पिता की अलग-अलग लुक वाली तस्वीरों ने भी बचपन में उन्हें प्रभावित किया। आकाश के अनुसार, जब वह लगभग चार-पांच साल के थे, तभी उन्होंने अभिनेता बनने का मन बना लिया था। उनके पिता ने भी इस इच्छा को प्रोत्साहित किया और अभिनय सीखने के लिए थिएटर से जुड़ने की सलाह दी।
थिएटर ने उनके अभिनय की बुनियाद तैयार करने में अहम भूमिका निभाई। मंच पर काम करने से उन्हें किरदारों को समझने, संवादों पर पकड़ बनाने और अभिनय की बारीकियां सीखने का अवसर मिला। यह अनुभव आगे चलकर फिल्मों में काम करते समय उनके लिए उपयोगी साबित हुआ।
आकाश के पिता स्वयं भी अभिनेता बनना चाहते थे, लेकिन पारिवारिक जिम्मेदारियों के कारण अपना सपना पूरा नहीं कर सके। आकाश ने एक साक्षात्कार में कहा था कि वह अपने पिता के उस अधूरे सपने को भी एक तरह से जी रहे हैं। उन्होंने अपने पिता को अपना सबसे बड़ा आलोचक बताया और कहा कि उनके साथ हुई चर्चाएं आज भी उन्हें अपने अभिनय को बेहतर बनाने की प्रेरणा देती हैं।
अभिनय के साथ कास्टिंग की दुनिया में भी किया काम
आकाश दहिया के करियर की एक खास बात यह है कि उन्होंने केवल अभिनेता के तौर पर ही काम नहीं किया, बल्कि फिल्मों की कास्टिंग से जुड़े काम में भी अनुभव हासिल किया। वह मुंबई में कास्टिंग निर्देशक मुकेश छाबड़ा के साथ काम कर चुके हैं। वर्ष 2008 के आसपास कास्टिंग के काम से जुड़े आकाश ने ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘रॉकस्टार’, ‘काई पो छे’, ‘हाईवे’ और ‘पीके’ जैसी फिल्मों की कास्टिंग टीम के साथ काम किया। उन्होंने एक साक्षात्कार में कास्टिंग के अनुभव को अपने लिए अभिनय की पाठशाला बताया था। उनके मुताबिक, इस काम ने उन्हें कलाकारों, किरदारों और निर्देशन की प्रक्रिया को करीब से समझने का अवसर दिया। कास्टिंग के क्षेत्र में काम करने का लाभ उन्हें अभिनय में भी मिला। इससे उन्हें यह समझने में मदद मिली कि किसी किरदार के लिए कलाकार का चयन कैसे किया जाता है, निर्देशक किसी भूमिका में क्या तलाशता है और कहानी की जरूरत के अनुसार अभिनय को किस तरह ढाला जाता है।
‘देव डी’ से शुरू हुआ फिल्मी सफर
आकाश दहिया के अभिनय करियर की शुरुआत अनुराग कश्यप की फिल्म ‘देव डी’ से जुड़ी रही। उन्होंने एक साक्षात्कार में बताया था कि फिल्म के ऑडिशन के लिए वह बुखार होने के बावजूद पहुंचे थे। अनुराग कश्यप की फिल्म ‘ब्लैक फ्राइडे’ देखने के बाद वह उनके काम से प्रभावित थे। ऑडिशन के कुछ दिन बाद उन्हें चयन की सूचना मिली। आकाश ने इस अनुभव को अपने करियर के यादगार शुरुआती पलों में गिना था। इसके बाद उन्होंने अलग-अलग फिल्मों में छोटे और सहायक किरदार निभाए। ‘कमीने’ और ‘रॉकस्टार’ जैसी फिल्मों में उनकी शुरुआती भूमिकाएं रहीं। वर्ष 2011 में आई ‘चिल्लर पार्टी’ में ‘गुगली’ का किरदार निभाकर उन्हें पहचान मिली। आगे चलकर ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’, ‘डी-डे’, ‘सिद्धार्थ’, ‘मस्तराम’, ‘बॉबी जासूस’, ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ और ‘मेरठिया गैंगस्टर्स’ जैसी फिल्मों में भी उन्होंने काम किया।
‘डी-डे’ में असलम, ‘मेरठिया गैंगस्टर्स’ में अमित और ‘तनु वेड्स मनु रिटर्न्स’ में दीपक जैसे किरदार उनके फिल्मी सफर के उल्लेखनीय पड़ाव रहे। हालांकि वह लंबे समय तक मुख्य भूमिकाओं के बजाय सहायक और छोटे किरदारों में नजर आए, लेकिन उन्होंने अलग-अलग तरह की कहानियों और किरदारों के साथ काम करना जारी रखा।
फिल्मों से वेब सीरीज तक बनाई पहचान
समय के साथ आकाश दहिया ने ओटीटी की दुनिया में भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई। ‘ऑपरेशन परिंदे’, ‘दिल्ली क्राइम’, ‘अफसोस’, ‘रफूचक्कर’ और ‘मांडला मर्डर्स’ जैसे प्रोजेक्ट उनके अभिनय सफर का हिस्सा रहे हैं। वर्ष 2022 में ‘दिल्ली क्राइम 2’ को लेकर भी उनका नाम चर्चा में रहा। इसके अलावा ‘बिंदीया के बाहुबली’, ‘आगरा अफेयर’ और ‘परम सुंदरी’ जैसे हालिया प्रोजेक्ट उनके काम के दायरे को दिखाते हैं।
आकाश ने अभिनय के साथ लेखन में भी रुचि दिखाई है। एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया था कि वह अपनी कहानियों और व्यंग्य आधारित विचारों पर काम कर रहे हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उनकी दिलचस्पी केवल पर्दे पर अभिनय करने तक सीमित नहीं, बल्कि कहानियों और किरदारों के निर्माण की प्रक्रिया को समझने में भी है।
भगत सिंह के आखिरी भोजन पर बनी ‘द लास्ट मील’
आकाश दहिया के अभिनय सफर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा शॉर्ट फिल्म ‘द लास्ट मील’ भी है। यह फिल्म स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह के जीवन के उस प्रसंग पर आधारित है, जिसमें लाहौर जेल में फांसी से पहले उनके आखिरी भोजन की इच्छा को केंद्र में रखा गया है। फिल्म का निर्देशन केतकी पांडे ने किया है और आकाश ने इसमें भगत सिंह की भूमिका निभाई है। इश्तियाक खान ने भोगा और सारिका सिंह ने रानो का किरदार निभाया है। फिल्म की कहानी केवल भगत सिंह के आखिरी भोजन तक सीमित नहीं रहती, बल्कि उस समय समाज में मौजूद छुआछूत और जातिगत भेदभाव के सवाल को भी उठाती है। कहानी में भगत सिंह चाहते हैं कि जेल में सफाईकर्मी भोगा उनके लिए खाना तैयार करे। इस इच्छा के माध्यम से फिल्म इंसान की बराबरी, सम्मान और सामाजिक रूढ़ियों के खिलाफ खड़े होने के विचार को सामने लाती है।
फिल्म में मक्के की रोटी और सरसों के साग का प्रसंग भावनात्मक रूप से भी महत्वपूर्ण है। फांसी से पहले के समय में घर के खाने की याद और एक ऐसे व्यक्ति के हाथ का भोजन स्वीकार करने की इच्छा, जिसे समाज भेदभाव की नजर से देखता था, कहानी को एक अलग अर्थ देती है। आकाश दहिया के लिए भगत सिंह जैसे ऐतिहासिक व्यक्तित्व की भूमिका निभाना एक अलग तरह की अभिनय चुनौती रही। इस किरदार में केवल क्रांतिकारी के साहस को दिखाना ही नहीं, बल्कि उनके विचारों, संवेदनशीलता और सामाजिक बराबरी के नजरिये को भी व्यक्त करना जरूरी था।
छोटे किरदारों से लगातार काम तक का सफर
आकाश दहिया की यात्रा इस बात का उदाहरण है कि अभिनय की दुनिया में पहचान बनाने के लिए केवल मुख्य भूमिका मिलना ही जरूरी नहीं होता। थिएटर से शुरुआत, कास्टिंग के क्षेत्र में काम, फिल्मों में छोटे किरदार, ओटीटी प्रोजेक्ट और अलग-अलग तरह की कहानियों का चुनाव—इन सभी ने उनके अनुभव को आकार दिया। ‘चंद्रावल’ से जुड़ी उनकी याद और ‘फुलान’ के प्रमोशन में दोनों फिल्मों के नाम वाला ब्रोच इस यात्रा का भावनात्मक पक्ष सामने लाता है। वहीं ‘द लास्ट मील’ जैसी शॉर्ट फिल्म यह दिखाती है कि वह ऐतिहासिक और सामाजिक विषयों पर आधारित कहानियों का भी हिस्सा बने हैं। एक ओर फिल्मों और वेब सीरीज के जरिए उनका अभिनय सफर आगे बढ़ा, तो दूसरी ओर कास्टिंग और लेखन के अनुभव ने सिनेमा के प्रति उनकी समझ को व्यापक बनाया। यही विविधता आकाश दहिया के अब तक के करियर को दिलचस्प बनाती है।