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    राजनीति में बढ़ता जातिवाद

    casteism in politics

    विधान के अनुसार देश में प्रजातंत्र की स्थापना को आदर्श राज्य व्यवस्था माना गया है। चुनाव लोकतंत्र की आत्मा हैं। भले ही संविधान निर्मातओं ने जाति आधार पर आरक्षण की व्यवस्था की है लेकिन फिर भी उनका उद्देश्य जातिवाद से रहित और सामाजिक समानता वाले समाज का निर्माण करना है। चिंता वाली बात है कि बहुत से राजनेताओं ने जातिवाद को सत्ता प्राप्ति का एक माध्यम बना लिया है, जिससे देश एक बार फिर जातिवाद की मजबूत जकड़ में फंसता जा रहा है। शिरोमणी अकाली दल ने दलित व हिंदू वोट बैंक पर कब्जा करने के लिए इन दोनों वर्गों में से पंजाब में सरकार आने पर उप-मुख्यमंत्री बनाने का वायदा किया है। वहीं अब कांग्रेस भी पीछे नहीं रही, उन्होंने भी हिंदू-दलित पर दांव खेलते हुए कांग्रेस प्रदेशाध्यक्ष के साथ-साथ चार कार्यकारी अध्यक्ष्य नियुक्त किए हैं, जो विभिन्न जातियों से संबंधित हैं।

    इसी प्रकार पार्टियां सामाजिक संतुलन के नाम पर जातिवाद का पैंतरा अपनाने लगी हैं, जो जातिवाद को बढ़ावा देगा। इसी प्रकार उत्तर प्रदेश बसपा ने ब्राह्मणों के वोट बटोरने के लिए मुहिम छेड़ दी है, क्योंकि राज्य में 13 प्रतिशत ब्राह्मण हैं। यूं भी राजनीति में जातिवाद का पैंतरा कोई नई बात नहीं है, आजादी से लेकर अब तक जातिवाद के आधार पर ही नेताओं को टिकट दिया जाता रहा है। यदि जाति आधार पर किसी को टिकट नहीं मिलती तब संबंधित जाति का नेता आजाद उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़कर वोट काटने का काम करता है। इस प्रकार जाति आधार पर टिकट बांटने का चलन बढ़ता गया लेकिन अब यह चलन उप-मुख्यमंत्री के पद तक पहुंच गया है।

    जातिवाद के ही सहारे जहां एक ओर प्रतिभाहीन व्यक्ति ऊंचे-ऊंचे पदों को हड़प रहे हैं, वहीं दूसरी ओर प्रतिभावान दर-दर की ठोकरें खाते-फिरते हैं। इससे राष्ट्रीय कार्य क्षमता का हृास होता है। यह जागरूक वोटर का भी यह कर्तव्य है कि वे पार्टियों की नीतियां-रणनीतियों को देखते हुए अपने वोट के अधिकार का प्रयोग निष्पक्ष होकर देशहित व जनहित में करें। बात यह नहीं कि राजनीतिक पार्टियों को संबंधित जातियों से ज्यादा हमदर्दी है बल्कि यह तो चुनाव जीतने का एक फार्मूला है। ऐसी कोई सरकार नहीं आई जिसके कार्यकाल में जब दलितों पर अत्याचार न हुआ हो या किसी धर्म की सरकार द्वारा अनदेखी न की गई हो। किसी भी जाति को उप-मुख्यमंत्री बनाओ, लेकिन यह आवश्यक है कि सरकारों में उन जातियों के लोगों को बराबर व सही इंसाफ जरूर मिलना चाहिए।

     

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