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    ग़जल : तीरो-तलवार से नहीं होता

    तीरो-तलवार से नहीं होता
    काम हथियार से नहीं होता

    घाव भरता है धीरे-धीरे ही
    कुछ भी रफ्तार से नहीं होता

    खेल में भावना है ज़िंदा तो
    फ़र्क कुछ हार से नहीं होता

    सिर्फ़ नुक्सान होता है यारो
    लाभ तकरार से नहीं होता

    उसपे कल रोटियां लपेटे सब
    कुछ भी अख़बार से नहीं होता।

    -महावीर उत्तरांचली

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