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    दिल्ली vs केंद्र अधिकार विवाद / फैसला सुनाने वाले दोनों जज एकमत नहीं, मामला बड़ी बेंच के पास भेजा गया

    Delhi v/s Center Rights Dispute Both Judges Who Make The Verdict Unanimously

    2014 में आप के सत्ता में आने के बाद से दिल्ली सरकार और केंद्र के बीच प्रशासनिक कामों के अधिकार के लिए खींचतान

    नई दिल्ली। दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल (एलजी) के बीच अधिकारों की लड़ाई पर सुप्रीम कोर्ट में गुरुवार को ( Delhi v/s Center Rights Dispute Both Judges Who Make The Verdict Unanimously ) फैसला सुनाया गया। हालांकि, ज्वाइंट सेक्रेटरी लेवल के अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति के अधिकार पर बेंच के दोनों जज- एके सीकरी और अशोक भूषण एकमत नहीं थे। ऐसे में यह मामला बड़ी बेंच के पास भेज दिया गया। ज्वाइंट सेक्रेटरी और उससे ऊपर के अधिकारियों के तबादले-नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार के पास रहेगा। उससे नीचे के अधिकारियों के बारे मे दिल्ली को अधिकार, लेकिन इसके लिए बोर्ड गठित होगा। हालांकि, जस्टिस अशोक भूषण इस फैसले से असहमत थे।

    जस्टिस सीकरी ने कहा- ज्वाइंट सेक्रेटरी स्तर तक के तबादले-पोस्टिंग केंद्र करेगा, जस्टिस भूषण इससे असहमत

    एंटी करप्शन ब्यूरो केंद्र सरकार के पास रहेगा। सरकारी वकील की नियुक्ति दिल्ली सरकार के पास रहेगी। कमीशन ऑफ इंक्वायरी केंद्र सरकार के अंतर्गत रहेगी। दिल्ली में जो जमीन है उसका सर्किल रेट दिल्ली सरकार तय करेगी। इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड दिल्ली सरकार के पास रहेगा। जब एलजी और मुख्यमंत्री के बीच विवाद होगा तो एलजी की राय मानी जाएगी। जस्टिस एके सीकरी और अशोक भूषण की बेंच ने विभिन्न मुद्दों को लेकर केंद्र और दिल्ली सरकार की ओर से जारी नोटिफिकेशन्स को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर पिछले साल 1 नवंबर को फैसला सुरक्षित रख लिया था। 2014 में आम आदमी पार्टी के सत्ता में आने के बाद से केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच प्रशासनिक अधिकारों के लिए खींचतान जारी है।

    एलजी के पास प्रशासनिक अधिकार: केंद्र

    सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि दिल्ली में सर्विसेज को संचालित करने का अधिकार एलजी के पास है। साथ ही यह भी कहा था कि शक्तियों को दिल्ली के प्रशासक (एलजी) को सौंप दिया जाता है और सेवाओं को उसके माध्यम से प्रशासित किया जाता है। केंद्र ने यह भी कहा था कि जब तक भारत के राष्ट्रपति स्पष्ट रूप से निर्देश नहीं देते, तब तक एलजी मुख्यमंत्री या मंत्रिपरिषद से परामर्श नहीं कर सकते।

    स्वतंत्र रूप से निर्णय नहीं सकते एलजी: सुप्रीम कोर्ट

    4 अक्टूबर को दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से पूछा था कि वह जानना चाहते हैं कि 4 जुलाई को कोर्ट द्वारा दिल्ली में प्रशासन को लेकर दिए गए फैसले के संदर्भ में उनकी स्थिति क्या है? 4 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट की 5 जजों की बेंच ने राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन के लिए विस्तृत मापदंडों को निर्धारित किया था। कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि दिल्ली को एक राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता, लेकिन एलजी की शक्तियों को यह कहते हुए छोड़ दिया गया कि उसके पास स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की शक्ति नहीं है और उसे चुनी गई सरकार की सहायता और सलाह पर काम करना है।

    ‘दिल्ली की असाधारण स्थिति’

    पिछले साल 19 सितंबर को केंद्र ने शीर्ष अदालत को बताया था कि दिल्ली के प्रशासन को अकेले दिल्ली सरकार के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता है और देश की राजधानी होने के नाते यह ‘असाधारण’ स्थिति है। यहां संसद और सुप्रीम कोर्ट जैसे महत्वपूर्ण संस्थान हैं और विदेशी राजनयिक भी यहां रहते हैं। केंद्र ने सुप्रीम कोर्ट से स्पष्ट रूप से कहा था कि दिल्ली को राज्य का दर्जा नहीं दिया जा सकता।

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