पेरिस समझौते के प्रति बढ़ती उम्मीदें

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Increasing expectations towards the Paris Agreement

पिछले दिनों जलवायु परिर्वतन पर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन के विशेष दूत जॉन कैरी एक दिन की यात्रा पर भारत आए। यात्रा के दौरान कैरी ने जलवायु परिर्वतन के मुद्दे पर भारत की भूमिका की चर्चा करते हुए कहा कि भारत जलवायु परिर्वतन के लिए गठित टास्क फोर्स का अहम सदस्य है। भारत के पास इस चुनौती से निपटने के लिए पर्याप्त बौद्विक संसाधन है, और वह इस पर काबू पाने में बड़ा योगदान दे सकता हैं।

कैरी की इस यात्रा के बाद वैश्विक हल्कों में पेरिस जलवायु समझौते की चर्चा शुरू हो गयी है। ऐसा होना स्वाभाविक ही था। कैरी ने भारत यात्रा के दौरान ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी लाने के लिए बीजिंग का सहयोग प्राप्त करने हेतू अगले सप्ताह चीन जाने की बात भी कही थी। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति टंज्प के इस समझौते से अलग होने की बड़ी वजह भी भारत और चीन ही थे।

दूसरी ओर बाइडेन द्वारा जलवायु परिर्वतन पर विचार करने के लिए 22 और 23 अप्रेल को आयोजित किये जाने वाला शिखर सम्मेलन भी चर्चा के केन्द्र में है। वर्चुअल प्लेटफार्म पर होने वाले इस शिखर सम्मेलन में बाइडेन ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंन्द्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन, जापान के प्रधानमंत्री योशिहिदे सुगा, ब्राजील के राष्ट्रपति जायर बोलसनारो, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो, इसरायल के प्रधानमंत्री बैजामिन नेतन्याहू, तथा सउदी अरब के किंग शाह सलमान सहित दुनिया के 40 से अधिक देशों के नेताओं को आमंत्रित किया है।

चर्चा इस बात की भी है कि प्रस्तावित शिखर सम्मेलन से पहले अमेरिका पेरिस समझौते के तहत निर्धारित कार्बन उत्सर्जन को कम करने के लिए कोई बड़ी घोषणा कर सकता है। सवाल यह है कि अमेरिका और उसके राष्ट्रपति बाइडेन पेरिस समझौते को लेकर इतने उतावले क्यों हो रहे है। दरअसल, अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते से दोबारा जोड़ना चाहते है। उन्होंने अपने चुनाव कैंपेन के दौरान भी अमेरिका को पेरिस जलवायु समझौते में दोबारा शामिल करने की बात कही थी। अपने कार्यकाल के पहले ही दिन व्हाइट हाउस से पेरिस जलवायु समझौते में अमेरिका की दोबारा वापसी की घोषणा की थी।

पृथ्वी को जलवायु परिवर्तन के खतरे से बचाने और ग्रीन हाउस गैंसों के उत्सर्जन को निश्चित सीमा तक बनाए रखने के उद्देश्य को लेकर सन 1992 में रियो-डी-जेनेरियो में पृथ्वी सम्मेलन के अवसर पर पर्यावरण ओर विकास पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन (यूएनसीईडी) में दी यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कंवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) नामक एक अंतरराष्ट्रीय संधि की गई। 1994 में निर्मित इस संधि का उद्देश्य तेज गति से बढ़ रहे वैश्विक तापमान में कमी लाने के लिए ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को कम करना था। यूएनएफसीसीसी में शामिल सदस्य देशों का सम्मेलन कांफ्रैंस ऑफ़ पार्टीज (सीओपी) कहलाता है।

वर्ष 1995 से सीओपी के सदस्य देश प्रतिवर्ष आयोजित शिखर सम्मेलन में मिलते हैं। दिसबंर 2016 में पेरिस में आयोजित सीओपी की 21 वीं बैठक में कार्बन उत्सर्जन में कटौती के जरिये वैश्विक तापमान में होने वाली वृद्धि को 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखने और 15 डिग्री सेल्सियस के आदर्श लक्ष्य को लेकर एक व्यापक सहमति बनी थी। इस बैठक के बाद सामने आए 18 पन्नों के दस्तावेज को सीओपी-21 समझौता या पैरिस समझौता कहा जाता है। अक्टूबर 2016 तक 191 देश इस समझौते पर हस्ताक्षर कर चुके थे। समझौता 2020 तक लागू होना था। लेकिन सदस्य देशों के बीच समझौते के प्रावधानों पर सहमति होने पर इसे पहले भी लागू किये जा सकने का प्रावधाान किया गया था।

पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप शुरू से ही इस समझौते के आलोचक रहे हैं। उनका कहना था कि अमेरिका ने पेरिस में सही समझौता नहीं किया है। पेरिस समझौते से अमेरिका के औद्योगिक हित प्रभावित होंगे। उनका यह भी आरोप था कि इस समझौते में भारत और चीन के लिए सख्त प्रावधान नहीं किए गए हैं। इससे पहले उन्होंने भारत, रूस और चीन पर आरोप लगाते हुए कहा था कि ये देश प्रदूषण रोकने के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं। जबकि इसके लिए अमेरिका करोड़ो डॉलर दे रहा है। उन्होंने तो यहां तक कह दिया था कि विकसित देशों से अरबो डॉलर पाने के लिए भारत पेरिस जलवायु समझौते में शामिल हुआ हैं। साल 2017 में ट्रंप ने इस समझौते से हटने की घोषणा की थी।

अमेरिका के समझौते से हटने के बाद उन देशों के सामने गंभीर आर्थिक संकट खड़ा हो गया था। क्योंकि इन देशों को समझौते पर हस्ताक्षर करने के बदले में प्रतिवर्ष बड़ी रकम अमेरिका व अन्य पश्चिमी देशों से मिलती रही है। हालांकि, भारत भी जलवायु परिर्वतन के खतरों से प्रभावित होने वाले देशों में से एक है। इस लिए साल 2030 तक भारत ने अपनी कार्बन उत्सर्जन की गति को 2005 के मुकाबले 33-35 फीसदी तक कम करने का लक्ष्य रखा है।

कुल मिलाकर दुनिया के हर छोटे-बड़े देश को यह समझना होगा कि कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए जताई गई प्रतिबद्धता से मुंह मोड़ना विनाशकारी साबित हो सकता है। अगर इस महाविनाश से मानव सभ्यता को बचाना है, तो पैरिस समझौंते के पवित्र प्रावधानों को सभी के लिए मानना जरूरी होगा।

डॉ. एन.के. सोमानी

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