बेअदबी मामलों का आधार बने केस में सभी आरोपी बरी

बेअदबी मामलों का आधार बने केस में सभी आरोपी बरी

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चंडीगढ़, अश्वनी चावला । पंजाब में वर्ष 2015 के बेअदबी मामलों से जोड़कर देखे गए वर्ष 2011 के मोगा बस आगजनी और गोलीबारी मामले में चंडीगढ़ की अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी  आरोपियों को बरी कर दिया है। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अरविंद कुमार की अदालत ने यह फैसला सुनाया। मामला मोगा में पीआरटीसी की बस को आग लगाने और गोलीबारी की घटना से संबंधित था। बाद के वर्षों में इस मामले को बेअदबी प्रकरणों से जोड़कर भी देखा गया, जिसके चलते इसकी जांच और आरोपियों की गिरफ्तारी को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

    मामले की शुरूआत वर्ष 2011 में हुई थी। मोगा के सिटी थाने में एफआईआर नंबर 33 दर्ज की गई थी। पुलिस ने अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी। बाद में पुलिस ने अनसुलझा बताते हुए अंतिम रिपोर्ट पेश कर दी थी। हालांकि, करीब सात साल बाद 10 जून 2018 को मोहिंदर पाल उर्फ बिट्टू की गिरफ्तारी दिखाई गई। मोहिंदर पाल को डेरा सच्चा सौदा, सिरसा की 45 सदस्यीय समिति का सदस्य बताया गया था। पुलिस ने मोहिंदर पाल के कथित खुलासे के आधार पर 11 लोगों को आरोपी बनाया और उनके खिलाफ अदालत में आरोपपत्र दाखिल किया। इनमें मोहिंदर पाल उर्फ बिट्टू, सुखजिंदर सिंह, शक्ति सिंह, रणदीप सिंह, बलजीत सिंह, निशान सिंह, रंजीत सिंह, नरेंद्र शर्मा, प्रदीप कुमार, संदीप सिंह और पृथ्वी सिंह सहित अन्य आरोपी शामिल थे।

दो आरोपियों की हत्या के बाद चंडीगढ़ स्थानांतरित हुआ मुकदमा

मुकदमे की सुनवाई के दौरान दो आरोपियों की हत्या हो गई। मोहिंदर पाल उर्फ बिट्टू की जेल में हत्या कर दी गई, जबकि प्रदीप कुमार को दिनदहाड़े गोली मार दी गई थी। प्रदीप कुमार का नाम वर्ष 2015 के बेअदबी मामलों में कथित भूमिका को लेकर भी सामने आया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मामले की सुनवाई मोगा से चंडीगढ़ स्थानांतरित कर दी गई।

वर्षों पुरानी एफआईआर दोबारा खोलने पर भी सवाल

आरोपियों की ओर से अधिवक्ता अमर डी. कामरा, केवल सिंह बराड़ और हरीश छाबड़ा ने अदालत में दलील दी कि जिस एफआईआर की जांच के बाद पुलिस पहले ही अंतिम रिपोर्ट पेश कर चुकी थी, उसे वर्षों बाद दोबारा सक्रिय किया गया। बचाव पक्ष ने आरोप लगाया कि इस मामले का इस्तेमाल आरोपियों को वर्ष 2015 के बेअदबी प्रकरणों में झूठा फंसाने के लिए किया गया। इसके साथ ही पुलिस की ओर से पेश गवाहों और दस्तावेजों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठाए गए।

सीबीआई की जांच का भी दिया हवाला

सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने बेअदबी मामलों में सीबीआई की ओर से की गई जांच का उल्लेख भी किया। बचाव पक्ष के मुताबिक, सीबीआई ने आरोपियों की कथित भूमिका की वैज्ञानिक और विस्तृत जांच की थी, लेकिन उस जांच से पंजाब पुलिस की कहानी की पुष्टि नहीं करते हुए पंजाब पुलिस के सभी दावे झूठे करार दिए थे। सीबीआई द्वारा आरोपियों का  पॉलीग्राफ परीक्षण करवाया गया था जिसमे उनकी बेअदबी के केसों में संलिप्तता नहीं पाई गयी थी, जिसके पश्चात सीबीआई द्वारा इन आरोपियों को क्लीन चिट देते हुए क्लोजर रिपोर्ट अदालत में फाइल कर दी थी। 

गिरफ्तारियों को लेकर बचाव पक्ष ने उठाए सवाल

अदालत में बचाव पक्ष ने पुलिस की गिरफ्तारी संबंधी कार्रवाई पर सवाल उठाए। आरोपियों की ओर से दलील दी गई कि पुलिस ने जिन तारीखों और समय पर उनकी गिरफ्तारी दिखाई, उससे पहले ही वे पुलिस हिरासत में थे। इस दावे के समर्थन में 10 जून 2018 को प्रकाशित एक समाचार पत्र की खबर और उसे प्रकाशित करने वाले पत्रकार की गवाही का हवाला दिया गया। बचाव पक्ष के अनुसार, आरोपी 9 जून 2018 तक पुलिस हिरासत में थे, जबकि पुलिस की ओर से गिरफ्तारी का घटनाक्रम बाद में दर्शाया गया। बचाव पक्ष का यह दावा है कि मोहिंदर पाल को पालमपुर से हिरासत में लिया गया था जबकि पुलिस ने अलग ही कहानी बना कर पेश की थी।

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