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    बंद मुट्ठियों की दास्तां

    Literature
    हम छुट्टी वाले दिन बाहर घूमने चले जाते। उस लड़के के साथ अनेक जगहों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गोवा आदि राज्यों के शहरों में भ्रमण किए।

    …गतांक से आगे जज यह सब कुछ सुन कर आश्चर्य में पड़ गए तथा उन्होंने बहुत सोच विचार के पश्चात कहा, ‘‘बेटी सुनो, तस्कर (स्मगलर) लोग किसी के भी सगे नहीं होते। इनको खुद का पता नहीं होता कि अगले पल उनके साथ क्या होने वाला है? यह लोग पुलिस के साथ उतनी देर आँख मिचौली खेलते हैं, जब तक यह गिरफ्तार नहीं हो जाते। इनका भविष्य एक ऐसी गुफा है जिससे निकलने का कोई रास्ता ही नहीं होता। इनको आखिर हथियार फेंकने पड़ते हैं। इन लोगों में प्यार, विश्वास, संस्कार, इकरार नाम की कोई चीज नहीं होती। यह तो मौत का धागा बांध कर इस तरह के कार्य करते हैं। आज बरी (बहाल) हो जाएगा तो फिर किसी-न-किसी दिन शिकंजे में फंस जाएगा। यह लोग तो अपने घर वालों के साथ भी धोखा करते हैं। प्यार की परिभाषा क्या है? इनसे कोसों मील दूर है। Literature

    दरअसल इनके प्यार के ऊपर वाले हिस्से में शहद तथा नीचे वाले हिस्से में खतरनाक जहर होता है सांप की भांति। देखो, माता-पिता की अनुमति के बगैर कभी भी शादी नहीं करनी चाहिए। अपनी मिट्टी के परम्परावादी संस्कारों से जुड़े रहना सभ्याचारक इंसानियत होती है। बेटी तस्कर (स्मगलर) लोगों पर कभी भी भरोसा नहीं करना चाहिए। ये किसी भी वक्त मौत के मुंह में जा सकते हैं। ये लोग बड़े लोगों के इशारों पर काम करते हैं। एक-न-एक दिन ये पकड़े ही जाते हैं। बेटी तू कुछ समय सोच ले, अपने घर वालों से बातचीत कर ले। मेरे ख्याल में तुझे इस लड़के के साथ शादी नहीं करनी चाहिए। मेरा निजी तजुर्बा है कि इन लोगों की जिंदगी सुरक्षित नहीं होती। मैं अनेकानेक मुकदमों में ऐसे लोगों को सजा सुना चुका हूं। ये लोग सारी उम्र के लिए नकारा हो जाते हैं। यह लोग न घर के न बाहर के रहते हैं।’’ Literature

    डाक्टर साहिब मैं बजिद हो गई तथा जज साहिब को तरले-मिन्नते करते हुए कहा, ‘‘सर मैं बहुत दूर निकल चुकी हूँ , अब वापस नहीं आ सकती। प्लीज सर हेल्प मी, सर मैं सारी उम्र आप का एहसान नहीं भुलूंगी। सर, जहां तक घरवालों (माता-पिता) का सवाल है, सर मैं पढ़ी लिखी हूँ। खुद कमाती हूँ, मुझे अपने भविष्य के बारे में अच्छे बुरे फैसले लेने का पूरा हक है। सर, औरत को भी अपनी मर्जी से जीने का अधिकार होना चाहिए। जज साहब ने मजबूर होकर कहा, ‘‘अच्छा बेटी अगर तुम इतनी ही दूर चली गई हो। अगर पक्का मन बना ही लिया है तो फिर कुछ तारीखों के बाद उसको बरी कर दूंगा, परन्तु तुम किसी से भी यह बात नहीं कहोगी।’’ विनम्रता से सिर झुका कर जज से कहा, ‘‘थैंक्यू सर, थैंक्यू वेरी मच सर।’’ Literature

    मैं खुशी से फूली नहीं समा रही थी। ड्यूटी के बाद शाम को मैं उस लड़के से मिली और उसे सारी बात बता दी और उसे हिदायत की कि तू किसी से यह बात नहीं करेगा। लड़का बहुत खुश हुआ। हम नई जिंदगी के बारे कई हसीन सपने देखने लगे। भविष्य की अनेक योजनाओं का चित्रण कर लिया। हम छुट्टी वाले दिन बाहर घूमने चले जाते। उस लड़के के साथ अनेक जगहों हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, गोवा आदि राज्यों के शहरों में भ्रमण किए। भ्रमण का सारा खर्च वह लड़का ही करता था, हम दोनों बहुत खुश थे। एक दिन जज ने मुझे बुला कर कहा, ‘‘देखो बेटी, दो दिनों के पश्चात मैं इस लड़के को बरी कर दूंगा तथा तुम खुशी खुशी शादी कर लेना।’’ Literature

    लड़के ने मुझे कहा कि जिस दिन मैं बरी हो जाऊंगा मैं तुझे 5 बचे के बाद तेरी ड्यूटी के बाद, बस स्टैंड के बाहर एक स्तम्भ के नीचे मिलूंगा तथा वहां से फिर हम गाड़ी में बैठकर चले जाएंगे।’’ उसने मेरे साथ समय व स्थान निश्चित कर लिया। निश्चित समय वाले दिन जज ने लड़के को बरी कर दिया। लड़का मुझे कोर्ट में इशारा कर के चला गया। मेरी खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। जैसे विजयी सपनों के पंखों से मैं उड़ती जाऊं। डाक्टर साहिब मैं पांच से पहले ही बस स्टैंड के सामने उस स्तम्भ के नीचे जाकर खड़ी हो गई। अनेक तरंगे, उमंगे, चाव, उम्मीदों से मेरा दिमाग खुशियों से भर गया। जैसे सारा संसार मेरे कदमों के नीचे आ गया हो। Literature

    जैसे परमात्मा ने मेरी मुँह मांगी मुराद पूरी कर दी हो। खुशी में पागल सी होती जा रही थी। सच डाक्टर साहिब जब सपने हकीकत में साकार होते हैं तो मनुष्य जन्नत की तो क्या भगवान की परवाह नहीं करता। मैं उस स्तम्भ के नीचे खड़ी उसका बेसब्री से स्थिर दृष्टि लगा कर इंतजार कर रही थी। पांच बज गए, छह बज गए। मेरे दिल की धड़कनें बढ़ने लगीं। परन्तु जज साहिब के कहे शब्द कानों में गूंजने लगे। एक भय सारे शरीर में अग्नि की लहर बन कर दौड़ने लगा। एकदम ठंडा पसीना आने लगा। डाक्टर साहब मैं कई घण्टे वहां उसका इंतजार किया, वह नहीं आया। अब मुझे पूरा यकीन हो गया कि उसने मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा किया है। मैं क्रोध में आकर दोनों मुट्ठियां जोर जोर से स्तम्भ पर मारती गई, बस, डाक्टर साहिब तब से यह दोनों मुट्ठियां बंद हैं, खुलती नहीं।

    बलविन्द्र बालम गुरदासपुर, ओंकार नगर, गुरदासपुर (पंजाब) 

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