
प्रेमी मान सिंह इन्सां पुत्र सचखंड वासी प्रेमी वरियाम सिंह जी गांव कराईवाला जिला श्री मुक्तसर साहिब (पंजाब) से पूजनीय बेपराह शाह मस्ताना जी महाराज की एक अनोखी लीला का वर्णन इस प्रकार करता है:
सन् 1960 से पहले की बात है। पूज्य बेपरवाह मस्ताना जी महाराज उन दिनों डेरा सांझा सच्चा सौदा धाम मलोट में थे। वहां आश्रम में पूज्य शहनशाह जी ने पानी एकत्रित करने के लिए एक कच्ची डिग्गी खुदवाई। उसके बाद उसे पानी से भर दिया गया। आश्रम में उन दिनों चिनाई की सेवा जोरों पर चल रही थी और पानी की सख्त जरूरत रहती थी।
अगले दिन सुबह करीब 10-11 बजे का समय था। संगत सेवा में जुटी हुई थी। पूज्य बेपरवाह जी तेरावास में विराजमान थे। घट-घट के जाननहार पूजनीय सतगुरु जी अचानक तेरावास से बाहर निकलते ही ऊंची आवाज में बोले, ‘बच्चा डिग्गी में गिर गया, उसे बाहर निकालो।’ गौरतलब है कि डिग्गी तेरावास से करीब एक एकड़ से भी अधिक दूर थी और इतनी दूर तक बच्चे के गिरने की आवाज किसी को भी सुनाई नहीं दी थी। वचन पाकर सेवादार प्रेमी डिग्गी की तरफ भागे। लड़का डिग्गी में गोते खा रहा था। एक सेवादार प्रेमी ने डिग्गी में छलांग लगाई और लड़के को बाहर निकाल लिया। लड़का ठीक था। इतने में वहां पर लड़के की मां आ गई, वह भी संगत के साथ आश्रम में सेवा कर रही थी। जब उसे पता चला कि उसका लड़का खेलता-खेलता डिग्गी में गिर गया, तो वह ऊंची-ऊंची रोने लगी।
उसने रोते-रोते कहा कि मेरे लड़के की उम्र ज्योतिषियों ने तेरह साल ही बताई थी और इसकी उम्र तो आज पूरी हो गई थी। बाबा जी! (पूजनीय शहनशाह मस्ताना जी महाराज को नमन करते हुए) आप जी ने ही मेरे बच्चे को बचाया है। इस पर पूजनीय सार्इं जी ने कड़कती आवाज में फरमाया, ‘इस बीबी को बाहर कढ्ढो, इह सानूं उजागर करदी है।’ आप जी ने सेवादारों को फरमाया कि डिग्गी को मिट्टी से भर देओ। हुक्मानुसार 15-20 सेवादार तुरंत डिग्गी को मिट्टी से भरने लगे। यह सेवा लगातार बाहर घंटे तक चली। सेवा की समाप्ति पर पूज्य सार्इं मस्ताना जी महाराज ने सेवादारों को तेरावास में अपने पास बैठाकर अत्यंत स्नेह देते हुए रूहानी संदेश दिया, ‘सेवा दा फल नगदो-नकद है। सेवा करने से मन की मैल उतर जाती है। मन-सुमिरन में जल्दी लगता है। सेवा करने से देह में तंदुरुस्ती आती है। सेवा का फल बहुत बड़ा है।’
जब डिग्गी गिराई (बंद करवाई) जा रही थी, तो एक भोला-सा प्रेमी अपने सतगुरु से इस प्रकार गिला प्रकट कर रहा था कि ‘ढाह घत्ती, बाबा जी ने ढाह घत्ती, सार्इं जी ने ढाह घत्ती।’ पूजनीय शहनशाह जी ने उस प्रेमी को पास बुलाकर प्रसाद दिया और फरमाया, ‘रजा में राजी सो मर्द गाजी।’ वर्णनीय है कि सच्चे सतगुरु जी के ऐसे आलौकिक खेलों को अनजान जीव समझ नहीं सकता। इतनी लम्बी-चौड़ी व गहरी डिग्गी खुदवाई, पानी भी भरा और सेवा के बाहने उक्त बीबी के बच्चे को जीवन-दान बख्श दिया, जबकि ज्योतिषियों के अनुसार, बच्चे की उम्र उसी दिन खत्म हो चुकी थी। सतगुरु के परोपकारों का जीव कभी देन नहीं दे सकता।