हमसे जुड़े

Follow us

16.1 C
Chandigarh
Sunday, March 1, 2026
More
    Home विचार प्रेरणास्रोत जोंक से उपचार...

    जोंक से उपचार की विधि ‘जलौकावचारण’

    Leech

    आपने अकसर देखा होगा कि नमक को खुले में रखने से कुछ दिन के बाद वो चिपचिपा हो जाता है और इसी हाल में रहने पर पूरी तरह से पिघल जाता हैं। ये ऐसा इसलिए होता है कि नमक हवा से नमी (हवा में घुली पानी की भाप) सोख लेता हैं। जब तक नमक में नमी की मात्रा कम रहती है तब तक वो चिपचिपा बनकर रहता है। मगर जैसे नमी की मात्रा बढ़ती है तो पूरी तरह से पिघल जाता है। जब हम जोंक पर नमक छिड़कते हैं तो नमक तुरंत उसके शरीर से पानी सोंखना शुरू कर देता है। उसके शरीर में पानी कम हो जाने के कारण वो छटपटाता है और आखिर मर जाता है। खून चूसने के लिए कुख्यात माने जाने वाले जीव जोंक का इस्तेमाल असाध्य बीमारियों के इलाज में किया जा रहा है। जोंक के खून चूसने की स्वाभाविक खूबी के साथ सामंजस्य बैठाते हुए चिकित्सीय जगत में इसका उपयोग स्वच्छ रक्त के बजाय दूषित रक्त को निकालने में किया जा रहा है।

    जोंक से उपचार की विधि को आयुर्वेद में जलौकावचारण विधि की संज्ञा दी जाती है। चिकित्सा विज्ञान में इस विधि को लीच थैरेपी भी कहा जाता है। लीच थैरेपी से डायबिटिक फुट, गैंगरिन, सोरायसिस, नासूर समेत कई बीमारियों का सफलता से इलाज हो रहा है। डीप वेन थ्रंबायोसिस जिसमें पैर कटवाने की नौबत आ जाती है, में यह विधि कारगर है।  जोंकों को प्रभावित अंगों के ऊपर छोड़ दिया जाता है। जोंक अपने मुंह से ऐसे एंजाइम का स्राव करते हैं जो व्यक्ति को यह अहसास ही नहीं होने देते कि शरीर से खून चूसा जा रहा है। कृमि प्रजाति के इस जीव की सबसे बड़ी खासियत इसके स्लाइवा में मिलने वाला हिरुडिन नामक एंजाइम है, जो रक्त में थक्का नहीं बनने देता है।

    इसके स्राव से स्वच्छ रक्त का प्रवाह तेजी से होता है। जोंक दूषित रक्त को ही चूसती है। एक बार में जोंक शरीर से 5 मिलीलीटर खून चूस लेती है। यह प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक प्रभावित अंग से दूषित रक्त को पूरी तरह चूस नहीं लिया जाता। दूषित रक्त की समाप्ति से स्वच्छ रक्त प्रवाह होता है जिससे जख्म जल्दी भरते हैं। डायबिटिक मरीजों के लिए शल्य क्रिया काफी खतरनाक मानी जाती है। इसकी वजह जख्मों को भरने में सामान्य के मुकाबले अत्यधिक समय लगता है। इस बीच कई बीमारियों के खतरे की आशंका बन जाती है। लीच थैरेपी इन सब मुसीबतों से निजात दिलाती है। इंफेक्शन न हो, इसके लिए एक जोंक का एक ही मरीज के लिए प्रयोग किया जाता है। दूषित रक्त चूसने के बाद इनको उल्टी कराई जाती है, ताकि ये अपने मुंह से दूषित रक्त निकाल दें।

     

    अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।