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    संपादकीय : पिछली बार तब्लीगियों पर कार्रवाई हुई चुनाव आयुक्तों पर देर क्यों?

    Haryana News
    Haryana News: सरकार की नगर निकाय चुनावों से जुड़े अधिकारी-कर्मचारियों के तबादले व नियुक्तियों पर रोक

    मद्रास हाईकोर्ट ने भारतीय चुनाव आयोग को लताड़ा है कि चार राज्यों में चुनाव रैलियों को न रोक पाने का कोविड गाइडलाइन्स का उल्लंघन करने पर फैली आपदा के लिए उन पर क्यों न मानव हत्या के मुकदमे चलाए जाएं? इस वक्त पूर्व चुनाव आयुक्त टी.एन.शेषन याद आ गए हैं, जिनके बारे में यह मशहूर हो गया था कि वह सुबह के नाश्ते में नेता खाते हैं। शेषन एक कड़क चुनाव आयुक्त थे। उनसे पहले कभी देश को एहसास भी न था कि देश में चुनाव आयोग नाम की कोई संवैधानिक संस्था भी है। परन्तु लग रहा है कि चुनाव आयोग का राजनीतिकरण हो चुका है, अन्यथा यह संभव न था कि देश कोरोना की आपदा से जूझ रहा है और देश के चार राज्यों में चुनावी रैलियों में चुनाव आयोग की सख्ती व कोरोना गाइडलाइन्स का पालन नदारद रहें। निश्चित रूप से चुनाव आयोग के आयुक्त से लेकर निचले स्तर के बूथ अधिकारी तक सब पर मानव जीवन को खतरे में डालने के मुकदमें दर्ज किए जाने चाहिए।

    नैतिक तौर पर चुनाव आयोग को भी देश को अपना जवाब देना चाहिए कि आखिर क्या मजबूरियां थीं कि नेता चुनावों में भीड़ जुटाते, बिना मास्क, बिना आपसी दूरी, बिना सैनेटाइजर लोगों में वायरस का प्रसार करते रहे और चुनाव आयोग मूक दर्शक बना रहा? क्या चुनाव आयोग नेताओं के गुण्डों से डरते हुए कुछ नहीं बोला? क्या चुुनाव आयोग के अफसरशाह एवं अधिकारी नेताओं से पद के अलावा कोई अन्य लाभ पाते हैं जिस कारण उन्होंने नागरिकों के स्वास्थ्य के प्रति अपनी कोई जिम्मेवारी नहीं समझी? अब चुनाव हो गए नेता अपने-अपने एयर बबल में जा बैठे हैं और जनता सड़कों पर बिना आॅक्सीजन तड़फ-तड़फ कर अपनी जानें गंवा रही है, इनका जिम्मेवार कौन है? नेताओं ने देश व देशवासियों को महज वोट एवं सत्ता परिवर्तन का जरिया समझ लिया है और सरकार में बैठते मानों देशवासियों एवं देश के प्रति उनका कोई दायित्व ही नहीं रह जाता। जबकि देश का प्रबंध एवं देश की समस्याओं का निराकरण नेताओं की प्राथमिकता रहना चाहिए।

    अभी देश में आॅक्सीजन की उतनी कमी नहीं है जितनी आॅक्सीजन को स्टोर करने या उसे एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के लिए संसाधनों की कमी है। भारत से पहले कई दूसरे देश कोरोना की दूसरी लहर देख चुके थे, सरकार व प्रशासन को उन देशों से सीखना चाहिए था कि उन्हें वहां क्या-क्या समस्याएं आर्इं। अफसोस यहां केन्द्र में नेताओं की जमात को नेशनल-एंटी नेशनल एवं पूरे भारत पर अपना ही परचम फहराने से फुर्सत नहीं, देश की समस्याओं की चिंता तो बहुत दूर की बात है।

    हर समस्या का ठीकरा प्रधानमंत्री की लोकप्रियता से जलन पर लाकर फोड़ दिया जाता है। भाजपा को मानना होगा कि अगर नागरिक विकास व सुविधाओं की बात करते हैं तब वह उन्हें हर हाल मिलनी चाहिए इसके लिए त्याग, देश सेवा, ईमानदारी, बहादुरी, लोकप्रियता, धर्म, नैतिकता की दुहाई किसी काम की नहीं। पिछली दफा मरकज व तब्लीगी जमात पर रातोंरात प्राथमिकी दर्ज कर धरपकड़ शुरू कर दी गई थी, अब चुनाव आयोग पर सरकार क्या कोरोना फैलाने के लिए कोई एक्शन लेगी या ये काम भी न्यायालय को ही करना पड़ेगा?

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