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    राजनीतिक द्वेष व संवैधानिक पद

    West Bengal

    पश्चिम बंगाल में नेताओं व संवैधानिक पदाधिकारियों का झगड़ा शर्मनाक दौर में पहुंच गया है। राज्य के राज्यपाल जगदीप धनखड़ को विधानसभा परिसर में ही दाखिल नहीं होने दिया गया। अग्रिम सूचना होने के बावजूद जब उनकी गाड़ी गेट पर पहुंची तो वहां ताला लगा हुआ था। आखिर राज्यपाल पैदल चलकर विधान सभा में दाखिल हुए। यह घटनाक्रम बेहद शर्मनाक है। राज्यपाल और सरकार के बीच झगड़ा होना दो पार्टियों के भीतर खींचतान की तरह नजर आ रहा है। दरअसल तृणमूल सरकार और धनखड़ के बीच कशमकश उनके राज्यपाल की नियुक्ती के दौरान से ही चल रही है। विधान सभा में भी मुख्यमंत्री और राज्यपाल के बीच शिष्टाचार व सम्मान की कमी दिखी है।

    सत्र की शुरूआत के दौरान मुख्यमंत्री ने अपना भाषण तब पढ़ना शुरू किया जब राज्यपाल सदन से जा चुके थे। दरअसल इस टकराव का सही मायने में कारण राज्यपालों का राजनीतिक पृष्ठभूमि है। अधिकतर राज्यपाल सत्ताधारी पार्टी से ही नियुक्त किए जाते हैं। सक्रिय राजनीति से अलग हो चुके नेताओं को सत्तापक्ष राज्यपाल नियुक्त कर देती हैं। इसी कारण विरोधी पार्टी की सरकार वाले राज्य में राज्यपाल और सरकार के बीच टकराव वाले हालात बने रहते हैं। पश्चिमी बंगाल में ऐसा कोई भी मौका नहीं होगा, जब राज्यपाल और सत्तापक्ष पार्टी में टकराव न हुआ हो।

    किसी भी प्रकार का टकराव राज्य के हित में नहीं है। पश्चिम बंगाल में संबंध तृणमूल कांग्रेस सरकार की मुख्यमंत्री ममता बैनर्जी तेजतरार, बेबाक और सख्त मिजाज नेता हैं। केंद्र में भाजपा सरकार के साथ उनका 36 का आंकड़ा चल रहा है। राज्यपाल भाजपा से आए हैं दूसरी तरफ राज्य सरकारों में भी यह धारणा बन गई है कि राज्यपाल केवल रबड़ की मोहर होता है। राज्य सरकारें राज्यपाल की नियुक्ति को केंद्र सरकार की टेढ़े तरीके से राज्य में राजनीतिक दखलअंदाजी ही मानती है। सरकार को राज्यपाल के पद की गरिमा को समझना चाहिए और कम से कम शिष्टाचार में तो कोई कमी नहीं छोड़नी चाहिए। राज्यपाल को भी अपने पद और अधिकारों का प्रयोग करते हुए किसी भी तरह के राजनीतिक प्रभाव से दूर रहना होगा।

     

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