टपक सिंचाई का प्रयोग करके किसान बचा सकते हैं, पानी

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इस विधि से 95 प्रतिशत पानी आता है प्रयोग में (Drip Irrigation)

टपक सिंचाई वह विधि है, जिसमें जल को मंद गति से बूंद-बूंद के रूप में फसलों के जड़ क्षेत्र में एक छोटी व्यास की प्लास्टिक पाइप से प्रदान किया जाता है। इस सिंचाई विधि का आविष्कार सर्वप्रथम इजराइल में हुआ था। जिसका प्रयोग आज दुनिया के अनेक देशों में हो रहा है। इस विधि में जल का उपयोग अल्पव्ययी तरीके से होता है, जिससे सतह वाष्पन एवं भूमि रिसाव से जल की हानि कम से कम होती है।

सिंचाई की यह विधि शुष्क एवं अर्ध

शुष्क क्षेत्रों के लिए अत्यन्त ही उपयुक्त होती है, जहां इसका उपयोग फल बगीचों की सिंचाई हेतु किया जाता है। टपक सिंचाई ने लवणीय भूमि पर फल बगीचों को सफलतापूर्वक उगाने को संभव कर दिखाया है। इस सिंचाई विधि में उर्वरकों को घोल के रूप में भी प्रदान किया जाता है। टपक सिंचाई उन क्षेत्रों के लिए अत्यन्त ही उपयुक्त है, जहां जल की कमी होती है। खेती की जमीन असमतल होती है और सिंचाई प्रक्रिया खर्चीली होती है। बूंद-बूंद सिंचाई प्रणाली कृषि क्षेत्र में नई क्रान्ति लेकर आई है। इससे पानी की खपत कम होती है, बिजली का खर्चा कम होता है और मानव श्रम भी कम लगता है। मिट्टी की उर्वरता भी प्रभावित नहीं होने पाती है।

सिंचाई संसाधनों के विकास को ध्यान में रखकर ही प्रति बूंद अधिक फसल की अवधारणा लागू की जा रही है। यानी हम सिंचाई मद में अधिक पानी भी नहीं खर्च करेंगे और सिंचाई के लिए उपयुक्त होने वाली हर बूंद का फसल के लिए फायदा लेंगे। इससे न सिर्फ सिंचाई मद में होने वाला खर्च कम होगा बल्कि कम लागत में अधिक उपज लेने का सपना भी साकार होगा। बल्कि कम लागत में अधिक उपज लेने का सपना भी साकार होगा। केन्द्र सरकार की ओर से शुरू की गई प्रधानमंत्री ग्राम सिंचाई योजना का लक्ष्य हर किसान का खेत सींचने के साथ प्रति बूंद अधिक फसल पैदा करने की व्यवस्था करना है।

टपक सिंचाई पद्धति की मुख्य विशेषताएं

  • टपक सिंचाई पद्धति के इस्तेमाल से समय और मजदूरी में होने वाला खर्च भी कम होता है। जड़ क्षेत्र में पानी सदैव पर्याप्त मात्र में रहता है।
    जमीन में वायु व जल की मात्र उचित क्षमता स्थिति पर बनी रहने से फसल की वृद्धि तेजी से और एक समान रूप से होती है।
  • फसल को हर दिन या एक दिन छोड़कर पानी दिया जाता है।
  • पानी अत्यंत धीमी गति से दिया जाता है।

टपक सिंचाई हेतु उपयुक्त फसलें

  • टपक सिंचाई कतार वाली फसलों (फल एवं सब्जी) वृक्ष एवं लता फसलों हेतु अत्यन्त ही उपयुक्त होती है, जहां एक या उससे
    अधिक निकास को प्रत्येक पौधे तक पहुंचाया जाता है। टपक सिंचाई को आमतौर से अधिक मूल्य वाली फसलों के लिए अपनाया जाता है क्योंकि इस सिंचाई विधि की संस्थापन कीमत अधिक होती है। टपक सिंचाई का प्रयोग आमतौर से फार्म, व्यवसायि क हरित गृहों तथा आवासीय बगीचों में होता है।

टपक सिंचाई के लाभ-:

  •  टपक सिंचाई में जल उपयोग दक्षता 95 प्रतिशत तक होती है, जबकि पारम्परिक सिंचाई प्रणाली में जल उपयोग दक्षता लगभग 50 प्रतिशत तक ही होती है। अत: इस सिंचाई प्रणाली में अनुपजाऊ भूमि को उपजाऊ भूमि में परिवर्तित करने की क्षमता होती है।
  •  टपक सिंचाई में उतने ही जल एवं उर्वरक की आपूर्ति की जाती है। जितनी फसल के लिए आवश्यक होती है। अत: इस सिंचाई विधि में जल के साथ-साथ उर्वरकों को अनावश्यक बर्बादी से रोका जा सकता है।
  •  इस सिंचाई विधि से सिंचित फसल की तीव्र वृद्धि होती है, फलस्वरूप फसल शीघ्र परिपक्व होती है।
  •  टपक सिंचाई विधि खरपतवार नियंत्रण में अत्यन्त ही सहायक होती है क्योंकि सीमित सतह नमी के कारण खरपतवार कम उगते हैं।
  •  जल की कमी वाले क्षेत्रों के लिए यह सिंचाई विधि अत्यन्त ही लाभकर होती है।
  •  टपक सिंचाई में अन्य सिंचाई विधियों की तुलना में जल अमल दक्षता अधिक होती है।
  •  इस सिंचाई विधि से जल के भूमिगत रिसाव एवं सतह बहाव से हानि नहीं होती है।
  •  इस सिंचाई विधि को रात्रि पहर में भी उपयोग में लाया जा सकता है।
  •  टपक सिंचाई विधि अच्छी फसल विकास हेतु आदर्श मृदा नमी स्तर प्रदान करती है।
  •  इस सिंचाई विधि में रासायनिक उर्वरकों को घोल रूप में जल के साथ प्रदान किया जा सकता है।
  •  टपक सिंचाई में जल से फैलने वाली पादप रोगों के फैलने की सम्भावना कम होती है।
  •  इस सिंचाई विधि में कीटनाशकों एवं कवकनाशकों के धुलने की संभावना कम होती है।
  •  लवणीय जल को इस सिंचाई विधि से सिंचाई हेतु उपयोग में लाया जा सकता है।
  •  इस सिंचाई विधि में फसलों की पैदावार 150 प्रतिशत बढ़ जाती है।
  •  पारम्परिक सिंचाई की तुलना में टपक सिंचाई में 70 प्रतिशत तक जल की बचत की जा सकती है।
  •  टपक सिंचाई में अन्य सिंचाई विधियों की तुलना में मजदूरी की कीमत कम होती है।
  •  इस सिंचाई विधि के माध्यम से लवणीय, बलुई एवं पहाड़ी भूमियों को भी सफलतापूर्वक खेती के काम में लाया जा सकता है।
  •  टपक सिंचाई में मृदा अपरदन की संभावना नहीं के बराबर होती है, जिससे मृदा संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
  •  टपक सिंचाई में जल का वितरण समान होता है।
  •  टपक सिंचाई में फसलों की पत्तियां नमी से युक्त होती हैं, जिससे पादप रोग की संभावना कम रहती है।
  •  टपक सिंचाई से उर्जा की भी बचत होती है।
  •  उत्पादकता और गुणवत्ता: टपक सिंचाई में पेड़-पौधों को प्रतिदिन जरूरी मात्रा में पानी मिलता है। इससे उन पर तनाव नहीं पड़ता।
  •  फलस्वरूप फसलों की बढ़ोतरी व उत्पादन दोनों में वृद्धि होती है। टपक सिंचाई से फल, सब्जी और अन्य फसलों के उत्पादन में 20 प्रतिशत से 50 प्रतिशत तक बढ़ोतरी संभव है।
  •  पानी: टपक सिंचाई द्वारा 30 से 60 प्रतिशत तक सिंचाई पानी की बचत होती है।
  •  जमीन: ऊबड़-खाबड़, क्षारयुक्त, बंजर जमीन शुष्क खेती वाली, पानी के कम रिसाव वाली जमीन और अल्प वर्षा की क्षारयुक्त जमीन और समुद्र तटीय जमीन भी खेती हेतु उपयोग में लाई जा सकती है।
  •  रासायनिक खादरू र्फटिगेशन से पोषक तत्व बराबर मात्र में सीधे पौधों की जड़ों में पहुंचाए जाते हैं, जिसकी वजह से पौधे पोषक तत्वों का उपयुक्त इस्तेमाल कर पाते हैं तथा प्रयोग किये गए उर्वरकों में होने वाले विभिन्न नुक्सान कम होते हैं। जिससे पैदावार में वृद्धि होती है। इस पद्धति द्वारा 30 से 45 प्रतिशत तक रासायनिक खाद की बचत की जा सकती है।
  •  खरपतवार: टपक सिंचाई में पानी सीधे फसल की जड़ों में दिया जाता है। आस-पास की जमीन सूखी रहने से अनावश्यक खरपतवार विकसित नहीं होते। इससे जमीन के सभी पौष्टिक तत्व केवल फसल को मिलते हैं।
    फसल में कीट व रोग का प्रभाव: टपक, इन लाइन पद्धति से पेड़-पौधों का स्वस्थ विकास होता है। जिनमें कीट तथा रोगों से लड़ने की ज्यादा क्षमता होती है। कीटनाशकों पर होने वाले खर्चे में भी कमी होती है।
  •  टपक सिंचाई में होने वाला खर्च और कार्य क्षमतारू टपक, इन लाइन सिंचाई पद्धति उपयोग के कारण जड़ के क्षेत्र को छोड़कर बाकी भाग सूखा रहने से निराई-गुड़ाई, खुदाई, कटाई आदि काम बेहतर ढंग से किये जा सकते हैं। इससे मजदूरी, समय और पैसे तीनों की बचत होती है।

टपक संयन्त्र के प्रमुख भाग :-

  •  हेडर असेंबली: हेडर असेंबली मतलब बाईपास, नॉन रिटर्न वॉल्व, एअर रिलीज वॉल्व आदि। टपक सिंचाई का दबाव और गति नियंत्रित करने के लिये बाईपास असेंब्ली का उपयोग किया जाता है।
  •  फिल्टर: पानी में मौजूद मिट्टी के कणों, कचरा, शैवाल, काई आदि से ड्रिपर्स के छिद्र बंद होने की संभावना रहती है। इस प्रक्रिया में स्क्रीन फिल्टर, सैंड फिल्टर, सैंड सेपरेटर, सेटलिंग टैंक आदि का समावेश होता है। पानी में रेत अथवा मिट्टी होने पर हाइड्रोसाइक्लॉ न फिल्टर का उपयोग किया जाना चाहिए। पानी में शैवाल, काई, पौधों के पत्ते, लकड़ी आदि सूक्ष्म जैविक कचरा हो तो सैंड फिल्टर देना जरूरी है। पानी के पूर्णत: साफ नजर आने पर भी सिंचाई संयंत्र में कम से कम स्क्रीन फिल्टर का उपयोग तो करना ही चाहिए।
  •  सैंड फिल्टर: सैंड फिल्टर का ढक्कन खोलकर बैकवॉश चालू करने के बाद फिल्टर के अंदर हाथ से रेत को अच्छे से तोड़ना चाहिए। फिल्टर से आने वाला पानी ढक्कन से बाहर निकलने दें। हाथ से रेत साफ करते समय अंदर के काले रंग के फिल्टर एलिमेंट्स को धक्का नहीं लगना चाहिए। इससे रेत के स्क्रीन फिल्टर में जाने की आशंका रहती है। इस दौरान बाईपास वॉल्व द्वारा पानी का प्रवाह नहीं नि कले। सैंड फिल्टर में आधा भाग रेत होना चाहिए। रेत की मात्रा कम होने पर पुन: नयी रेत फिल्टर पर अंकित लेबल, निशान, तक भरना चाहिए। सैंड फिल्टर की रेत नदी, नाले की रेत न होकर विशिष्ट पद्धति से बनी निश्चित आकार की नुकीली रेत हैं। इस रेत से पानी रिसते समय कचरा रेत में अटक जाता है। साधारण रेत से यह प्रक्रिया नहीं होती। इसलिये सैंड फिल्टर में कभी भी नदी-नाले की रेत का इस्तेमाल न करें।’

स्क्रीन फिल्टर: सैंड फिल्टर द्वारा नहीं छनने वाला बारीक कचरा स्क्रीन फिल्टर की जाली में अटकता है। धीरे-धीरे इस कचरे के जमा होने से जाली पर एक परत बन जाती है। इससे जाली के कार्य में रूकावट पैदा होती है। जाली साफ करने से पहले दोनों तरफ के रबर सील निकाल कर साफ करने के पश्चात फिर से जाली के ऊपर ठीक से फिट करना चाहि ए। अन्यथा पानी के दबाव से बिना छना पानी आगे निकल सकता है।

  •  रसायन और खाद देने के साधन: टपक सिंचाई द्वारा रासायनिक खादों का प्रयोग वेंचूरीए र्फटिलाइजर टैंक व र्फटिलाइजर पम्प के माध्यम से किया जा सकता है।

टपक सिंचाई संयंत्र की नित्य देखभाल

  •  हर दिन पम्प शुरू करने के बाद, संयंत्र का दबाव स्थिर होने पर सैंड फिल्टर की बैकवॉशिंग करना चाहिए तथा हायड्रोसाइक्लॉ न आरंभिक सफाई के बाद हर 5.6 घंटे या पानी की गुणवत्ता के अनुसार समय-समय पर फिल्टर्स साफ करने चाहिए।
  •  फिल्टर की सफाई होने के बाद हेडर असेम्बली के बाईपास वॉल्व की सहायता से उचित दाब नियंत्रित करना चाहि ए। उपयुक्त दबाव पर चलने वाले संयन्त्र से पानी सभी जगह समान मात्र में मिलता है।
  •  खेतों में निरीक्षण कर कहीं टूट-फूट या लीकेज होने पर तुरंत ठीक करवाएं। पाईप मुड़ा हुआ या दबा हुआ हो तो तुरंत सीधा करें।
  •  टपक संयन्त्र के सभी ड्रिपर्स से पानी ठीक तरह से गिरता है या नहीं इसका ध्यान रखना चाहिए।
  •  टपक सिंचाई पूर्ण होने के बाद जमीन का गीलापन सभी जगह एक जैसा है या नहीं यह देखना चाहिए।
  •  टपक सही जगह लगा है यह निश्चित करें।
  •  लैंटरल-इनलाइन का अंतिम छोर खोलकर पानी को 1.2 मिनट यहां से बाहर निकलने दें।
  •  आने वाले समय में वर्षा पर आधारित फल उत्पादन बहुत मुश्किल होता जा रहा है। दिन प्रतिदिन उर्वरकों की बढ़ती कीमतें तथा सख्त वातावरण के नियम जल तथा उर्वरकों के कुशल उपयोग की तरफ इशारा कर रहे हैं। इसलिए किसानों के पास फर्टिगेशन ही एकमात्र विकल्प रह जाता है। टपक सिंचाई के साथ पूर्णत: घुलनशील उर्वरकों के उपयोग से उत्पादन में कई गुणा वृद्धि हुई है लेकिन आमतौर पर उर्वरक परम्परागत उर्वरकों की तुलना में 10 गुणा से भी अधिक महंगे हैं। इसके अलावा सरकार नें भी पूर्ण रूप से घुलनशील उर्वरकों पर कोई सहायिकी नहीं दी है। इसलिए सरकार को यह रणनीति तैयार करनी चाहिए जिससे किसानों को सस्ते दामों में ये उर्वरक उपलब्ध हो सके तथा जगह-जगह जागरूकता शिविर का आयोजन करना चाहिए जिससे किसान नई नई तकनीकों को अपनाएं। इसके अलावा फर्टिगेशन का महत्व भी दिन प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है जिनका अलग-अलग फलदार पौधों के हिसाब से सही मानकीकरण करना जरूरी है।

निष्कर्ष : इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि टपक सिंचाई तकनीक में जल का उपयोग अल्पव्ययी तरीके से पौधों की सिंचाई हेतु होता है। सिंचाई की यह तकनीक न सिर्फ जल एवं मृदा संरक्षण को सुनिश्चित करती है अपितु इससे फसल पैदावार भी अधिक होती है। अत: संपोषित विकास के लक्ष्य प्राप्ति हेतु टपक सिंचाई आज समय की आवश्यकता है।

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