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    Water Harmful: प्लास्टिक की बॉटल में पानी पीते हैं तो हो जाए सावधान, ये है बीमारी को बुलावा, चौंकाने वाले आंकड़े

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    Water Harmful: प्लास्टिक की बॉटल में पानी पीते हैं तो हो जाए सावधान, ये है बीमारी को बुलावा, चौंकाने वाले आंकड़े

    Water Harmful: देवेन्द्रराज सुथार। आज के युग में जब स्वास्थ्य और सुविधा के नाम पर हम चुनते हैं बोतलबंद पानी, तो वास्तव में हम अपने ही शरीर के विरुद्ध एक लंबी लड़ाई का आरंभ कर रहे हैं। हाल ही में कनाडा के कॉनकॉर्डिया विश्वविद्यालय मॉन्ट्रियल के शोधकर्ताओं द्वारा जारी चौंकाने वाले आंकड़े इस सच्चाई को उजागर करते हैं कि बोतलबंद पानी पीने वाले व्यक्ति प्रतिवर्ष लगभग 90,000 अतिरिक्त माइक्रोप्लास्टिक कण अपने शरीर में डाल रहे हैं। ये सूक्ष्म कण हमारी रक्तधारा में घुलकर हृदय, मस्तिष्क और अन्य महत्वपूर्ण अंगों तक पहुंच जाते हैं। ये कण शरीर में निरंतर सूजन, कोशिकाओं पर आॅक्सीडेटिव दबाव, हार्मोनल असंतुलन, प्रजनन क्षमता में कमी और यहां तक कि कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों को जन्म दे सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि असली खतरा तत्काल विषाक्तता में नहीं, बल्कि इन विषाक्त पदार्थों के लंबे समय तक शरीर में संचित होने में छुपा है। यूरोपीय खाद्य सुरक्षा प्राधिकरण के अनुसार माइक्रोप्लास्टिक का सेवन मानव स्वास्थ्य के लिए चिंताजनक है। इस प्रकार वह पानी जिसे हम शुद्ध और सुरक्षित मानकर पीते हैं, वह वास्तव में हमारे अंदर ही एक धीमे जहर का काम कर रहा है।

    बोतलबंद पानी के सेवन से होने वाली समस्याओं की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब हम इन माइक्रोप्लास्टिक कणों के आकार और उनकी पहुंच को समझते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार ये कण 1 माइक्रोन से लेकर 5 मिलीमीटर तक के हो सकते हैं और ये प्लास्टिक बोतलों के निर्माण, भंडारण, धूप और तापमान के प्रभाव से टूटकर पानी में मिल जाते हैं। एक लीटर बोतलबंद पानी में 2.4 लाख प्लास्टिक के टुकड़े मिले हैं, जिसका 90 प्रतिशत हिस्सा नैनोप्लास्टिक कण हैं। ये नैनोप्लास्टिक कण अत्यधिक सूक्ष्म होने के कारण आसानी से रक्त-मस्तिष्क बाधक को पार कर जाते हैं और न्यूरोलॉजिकल क्षति का कारण बन सकते हैं। इतना ही नहीं, वैज्ञानिक अध्ययनों में यह भी पाया गया है कि माइक्रोप्लास्टिक कण मानव प्रजनन तंत्र को भी प्रभावित कर रहे हैं।

    शोधकर्ताओं द्वारा किए गए व्यापक अध्ययनों से पता चला है कि 10 से 78 प्रतिशत तक बोतलबंद पानी के नमूनों में दूषित तत्व मिले हैं। इनमें माइक्रोप्लास्टिक के अतिरिक्त फ्थेलेट्स और बिस्फेनॉल-ए जैसे खतरनाक रसायन भी शामिल हैं, जो हृदय रोग, मधुमेह और मोटापे जैसी जीवनशैली संबंधी बीमारियों को जन्म देते हैं। जब ये बोतलें लंबे समय तक स्टोर की जाती हैं या धूप-गर्मी के संपर्क में आती हैं, तो इनसे हानिकारक रसायन रिसने की दर और भी बढ़ जाती है। एक औसत व्यक्ति 5 ग्राम प्लास्टिक का उपभोग करता है, यह आंकड़ा विश्व वाइड फंड फॉर नेचर के अध्ययन से सामने आया है। इस प्रकार हर बार जब हम बोतलबंद पानी का सेवन करते हैं। आर्थिक दृष्टि से देखें तो प्लास्टिक प्रदूषण के कारण वैश्विक अर्थव्यवस्था को प्रतिवर्ष 139 बिलियन डॉलर का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

    बोतलबंद पानी की समस्या केवल स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक पर्यावरणीय और आर्थिक चुनौती भी है। प्रतिदिन दुनिया भर में लाखों प्लास्टिक बोतलों का उत्पादन होता है, जिसके लिए भारी मात्रा में कच्चा माल और ऊर्जा की आवश्यकता होती है। निर्माण प्रक्रिया में होने वाला कार्बन उत्सर्जन जलवायु परिवर्तन को तेज करता है। ब्रिटिश मेडिकल जर्नल ग्लोबल हेल्थ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में हर मिनट 10 लाख बोतलबंद पानी की बोतलें खरीदी जाती हैं। भारत के संदर्भ में देखें तो यह दुनिया के सबसे बड़े बोतलबंद पानी उपभोक्ता बाजारों में से एक है और 2023 में इसका बाजार 20,000 करोड़ रुपए तक पहुंच गया था। समाधान की दिशा में देखें तो नल के पानी को उचित फिल्टरेशन के साथ उपयोग करना सबसे अच्छा विकल्प है। घरेलू जल शुद्धीकरण प्रणालियां न केवल सुरक्षित बल्कि आर्थिक रूप से भी किफायती हैं। कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययनों में यह सिद्ध हो चुका है कि अच्छी गुणवत्ता वाला नल का पानी अधिकांश बोतलबंद पानी से बेहतर होता है। सरकारों को चाहिए कि वे बोतलबंद पानी पर सख्त नियम लागू करें और नल के पानी की गुणवत्ता सुधारने में निवेश बढ़ाएं। उपभोक्ताओं को भी जागरूकता के साथ अपने फैसले लेने होंगे। यह न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए, बल्कि आने वाली पीढ़ियों और पूरे ग्रह के कल्याण के लिए अत्यंत आवश्यक है। माइक्रोप्लास्टिक का यह संकट एक चेतावनी है कि हमें अपनी जीवनशैली पर पुनर्विचार करना होगा। आखिरकार, जीवन का आधार पानी को ही जहर नहीं बनने देना चाहिए।
    (यह लेखक के अपने विचार हैं)