Electricity Workers Strike: बिजली कर्मियों की हड़ताल ने याद दिलाए पुराने दिन, तो कुछ ने जनरेटर चलाकर दिखाई नई दौलत!
बिजली कर्मियों की हड़ताल ने याद दिलाए पुराने दिन, तो कुछ ने जनरेटर चलाकर दिखाई नई दौलत!
त्रिदेव मुंढालिया। Electricity Workers Strike: बिजली कर्मचारियों की महज एक दिन की हड़ताल ने लोगों को बिजली की अहमियत का अहसास करा दिया। हालात ऐसे बने कि कई लोग अपने कामकाज को जारी रखने के लिए जनरेटर का इंतजाम करते नजर आए। बिजली पर हमारी निर्भरता कितनी बढ़ चुकी है, इसकी तस्वीर इस एक दिन की हड़ताल में साफ दिखाई दी।
लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में कुछ दिलचस्प नजारे भी देखने को मिले। कहीं लोग बिजली के बिना परेशान नजर आए, तो कहीं जनरेटर का इंतजाम होता दिखाई दिया। इस बीच लोगों को पुराने दिन भी याद आ गए, जब बिजली हर घर तक नहीं पहुंची थी और जिंदगी आज की तरह बिजली पर निर्भर नहीं थी।
एक दौर था, जब घरों में फ्रिज नहीं होते थे। दूध को बर्तन में रखकर जाली से ढक दिया जाता था, ताकि मक्खियां न बैठें। गर्मियों में लोग छतों और आंगन में चारपाइयां बिछाकर सोते थे। लालटेन और ढिबरी की रोशनी में रात गुजरती थी, हाथ के पंखे से हवा की जाती थी और लोग सीमित साधनों में भी अपना जीवन गुजार लेते थे।
लेकिन अब जमाना बदल चुका है। फ्रिज, कूलर, एसी, वॉशिंग मशीन और मोबाइल हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। बिजली जाते ही कई काम रुक जाते हैं और लोगों को परेशानी होने लगती है। बिजली कर्मियों की हड़ताल ने एक बार फिर दिखा दिया कि आधुनिक जिंदगी बिजली के बिना कितनी मुश्किल हो गई है।
लेकिन इस हड़ताल का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर व्यंग्य करना जरूरी है।
मौसम में ठंडक है। रातें ऐसी हैं कि कई लोग बिना पंखे के भी आराम से सो सकते हैं। इसके बावजूद कुछ जगहों पर जनरेटर चलाकर बिजली का इंतजाम किया गया। जरूरत के लिए जनरेटर चलाना बिल्कुल समझ में आता है, लेकिन सवाल तब उठता है, जब खुद आराम से सोने की जरूरत से ज्यादा अपनी हैसियत दिखाने का शौक हावी नजर आए।
जनरेटर चालू कर दिया गया। अब बिजली आए या न आए, पूरे मोहल्ले को यह पता चल जाना चाहिए कि साहब के पास जनरेटर है! खुद को उसकी कितनी जरूरत है, यह अलग बात है, लेकिन पड़ोसियों को रातभर यह अहसास जरूर होना चाहिए कि मोहल्ले में कोई पैसे वाला रहता है।
साहब के घर में तो बिजली का इंतजाम हो गया, लेकिन आसपास के लोगों की नींद का क्या? जनरेटर के शोर से करवटें बदलते लोग शायद यही सोच रहे होंगे कि काश, साहब अपनी दौलत का प्रदर्शन दिन में कर लेते और रात में मोहल्ले को चैन से सोने देते!
लगता है अब अमीरी का पैमाना भी बदल गया है। पहले लोग अपनी दौलत जमीन-जायदाद, कारोबार और कामयाबी से दिखाते थे, लेकिन अब कुछ लोगों के लिए जनरेटर का शोर भी हैसियत का ऐलान बन गया है।
विडंबना देखिए, बिजली की हड़ताल ने कुछ लोगों को पुराने दिन याद दिलाए, तो कुछ ने इसी बहाने अपनी नई-नई दौलत दिखाने का मौका तलाश लिया। मौसम ठंडा है, लेकिन दिखावे का पारा सातवें आसमान पर है!
बेशक, हर किसी को अपनी जरूरत के हिसाब से जनरेटर चलाने का अधिकार है। लेकिन अपनी सुविधा के लिए पूरे मोहल्ले की नींद हराम कर देना कहां की समझदारी है? असली बात सिर्फ जनरेटर चलाने की नहीं, बल्कि उस सोच की है, जिसमें अपनी सुविधा के आगे दूसरों की परेशानी दिखाई ही नहीं देती।
बिजली कर्मचारियों की मांगों का समाधान होना चाहिए और आम जनता को परेशानी से बचाने के इंतजाम भी जरूरी हैं। लेकिन इस एक दिन की हड़ताल ने हमें कई बातें सोचने पर मजबूर कर दिया है। बिजली के बिना जिंदगी कितनी मुश्किल हो सकती है, यह तो दिखा ही, साथ ही यह भी नजर आया कि सुविधाओं के इस दौर में हमारी जरूरतें बढ़ने के साथ दिखावे की आदत भी कितनी बढ़ गई है।
आखिर में एक बात और समझने की जरूरत है। इंसान ने अपनी सुविधा के लिए बहुत कुछ बना लिया है, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि कुदरत के अपने नियम हैं। मौसम के हिसाब से खुद को ढालने की आदत भी बनाए रखनी चाहिए। हर परेशानी का हल मशीनों में तलाशना जरूरी नहीं है। आज बिजली है, कल किसी कारण से नहीं भी हो सकती। जनरेटर, इन्वर्टर और दूसरी सुविधाएं भी कभी जवाब दे सकती हैं। इंसान की बनाई चीजें जरूरत के वक्त धोखा दे सकती हैं, लेकिन प्रकृति के साथ तालमेल बिठाकर जीने की समझ हमेशा काम आती है।
इसलिए सुविधाओं का इस्तेमाल जरूर करें, लेकिन उनके इतने आदी न हो जाएं कि उनके बिना जीना ही मुश्किल लगने लगे। आखिर समझदारी इसी में है कि इंसान तकनीक का सहारा भी ले और कुदरत के हिसाब से जीना भी न भूले।
क्योंकि जनरेटर से घर तो रोशन हो सकता है, लेकिन अक्ल का बल्ब जलाने के लिए बिजली नहीं, समझदारी चाहिए!