सद्भावना से हो राम मंदिर के मुद्दे का समाधान

Published On

सुप्रीम कोर्ट ने अयोध्या में राम मंदिर के निर्माण करने के मामले में सभी राजनीतिक दलों को तीन माह में मामला सुलझाने के लिए कह दिया है। परिस्थितियों के अनुसार अदालत का फैसला न केवल ठीक है बल्कि यह देश की सद्भावनापूर्ण संस्कृति पर केंद्रित है।

1992 में बाबरी मस्जिद गिराने के बाद देश में बड़े स्तर पर सांप्रदायिक दंगे हुए लेकिन जैसे-जैसे समय गुजरता गया देश की जनता ने शांतिपूर्वक समाधान निकालने पर जोर दिया। भले यह मुद्दा राजनैतिक रंगत ले चुका है फिर भी इससे जुड़े कुछ दल इस बात के लिए राजी थे कि धार्मिक स्थानों के नाम पर देश में तनावपूर्ण परिस्थितियां पैदा करना ठीक नहीं है।

लेकिन यह काफी कष्टपूर्ण है कि बाबरी मस्जिद और राम मंदिर के मुद्दे पर सभी पार्टियों के नेता आपसी बातचीत से हल निकालने की जहमत भी नहीं उठा रहे। अदालती कैंपस में यह नेता इकठ्ठे बैठकर चाय-पानी भी पीते रहे। बाबरी मस्जिद के सबसे पुराने वादी हाशिम अंसारी के निधन पर हिंदू नेताओं ने भी दु:ख प्रकट किया।

यदि इस सद्भावना को देखा जाए तो अदालत से बाहर बातचीत से ही इस मामले को सुलझा लेना चाहिए, इसमें कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। राजनैतिक व सामाजिक तौर पर भी वर्तमान समय में मंदिर के मुद्दे पर कोई सार्वजनिक विरोध नहीं है। पिछले कुछ सालों में देश के कई क्षेत्रों में हिंदू-सिखों ने मस्जिदों के निर्माण में मुस्लिम भाईचारे का सहयोग किया।

पंजाब में देश के बंटवारे दौरान बंद पड़ी एक मस्जिद को हिंदू-सिखों ने मुकम्मल करवाया है। राजनीतिक दल इस मामले में नाजायज लाभ लेने से भी संकोच कर रहे हैं। अब भी हालात यह हैं कि कुछ मुस्लिम संगठन अयोध्या-बाबरी मस्जिद वाली जगह पर राम मंदिर बनाने के लिए सहमत हैं। इस मुद्दे पर लंबे समय तक संघर्ष करने वाली भाजपा भी मंदिर के निर्माण हेतु सहमति पर जोर दे रही है। ‘

अब मंदिर वहीं बनाएंगे’ की जगह पर ‘मंदिर जरुर बनाएंगे’ से सहमति की सुर और समझ सुनाई पड़ रही है। अदालत द्वारा दिए गए समय और सोच का लाभ उठाकर मुद्दे को सुलझाने में देरी नहीं की जानी चाहिए।

Hindi News से जुडे अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और Twitter पर फॉलो करें।

About The Author

Related Posts