Anmol Vachan: पूज्य गुरु जी के वचनों से जानिए, परमात्मा की धुन और काल की आवाज में क्या है अंतर?

‘प्रभु की आवाज सबके अंदर है, उसको पहचानो’

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Anmol Vachan: सच्चे रूहानी रहबर पूज्य गुरु संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां (Saint Dr. Gurmeet Ram Rahim Singh Ji Insan) फरमाते हैं कि सबके अंदर परमपिता-परमात्मा की वह मीठी आवाज, वह सुरीली आवाज चलती है जो आत्मा को शक्ति देने वाली है। जिस आवाज को सुनने से गम, चिंता, परेशानी इन्सान को नहीं सताती, जिसकी आवाज सुनने से इन्सान मालिक की दया-मेहर, रहमत के काबिल बन सकता है और उस धुन के सहारे खण्डों-ब्रह्मण्डों को पार करता हुआ इन्सान मालिक के दर्श-दीदार के काबिल बन सकता है। 

आप जी फरमाते हैं कि कोई जगह ऐसी नहीं जहां पर वो मालिक की धुन ना हो, हर जगह उस धुन से जीवन है, अगर वो धुन, आवाज बंद हो जाए तो प्रलय-महाप्रलय आने में देर न लगे। वो आवाज बहुत सुरीली है और उसमें जो नशा, लज्जत, खुशियां हैं  वैसी दुनिवायी साजो-सामान में किसी भी चीज में नहीं है। संतों ने वर्णन करते हुए लिखा है कि शहद, चीनी, गुड़ ये सब मीठे हैं, पर मालिक की धुन के मुकाबले ये मिठास तुच्छ है। वो ऐसी मिठास है जिसको सुनने से ना दुनिया का फिक्र रहता है और न ही खुद का। जिन भक्तों को उस आवाज का एक बार अहसास हो जाए, वो किसी गम, चिंता, परेशानी में नहीं पड़ते तथा काम-वासना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार उन्हें नहीं सताते। जो कहते हैं कि हमें धुन का नजारा मिला, फिर भी दुनिया  में फंसे रहते हैं, वो काल की आवाज के शिकार होते हैं। क्योंकि काल की आवाज भी बिल्कुल वैसी ही है, वो भी अंदर चलती है, वो भी मीठी है, लेकिन जब तक कोई उस परमपिता-परमात्मा की आवाज को नहीं सुनता उनके लिए वो काल की आवाज ही मीठी है। किन्तु मालिक की आवाज काल की आवाज से अरबों-खरबों गुणा मीठी होती है।

जो मालिक की धुन को सुन ले उसका गम, चिंता, परेशानी बाल भी बांका नहीं कर सकते और कामवासना, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार उन्हें पागल नहीं बना सकते। तो इन्सान को ये निर्णय जरूर करना चाहिए कि वह कौनसी आवाज सुने जा रहे हैं किसमें मस्त हैं, क्योंकि कई योगी-तपस्वी अपने-आप को भक्त कहलवाते हैं, लेकिन वास्तव में वो काल की आवाज में मस्त हुए होते हैं। काल और प्रभु की आवाज को पहचानने की शक्ति इन्सान को पैदा करनी चाहिए और ये केवल सुमिरन से ही सम्भव हो सकती है। इसलिए सुमिरन करने से प्रभु की आवाज अंदर से ही पैदा होती है और इन्सान दोनों जहानों की खुशियों से मालामाल हो जाता है।

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