Cow Dung Diyas: गुलाबी नगरी में आकार ले रही गौसेवा को बढ़ावा देने की ये अनूठी पहल
जयपुर के गाय के गोबर से बने 'गोबर दीपकों' की देश-विदेश में धूम
जयपुर (गुरजंट सिंह धालीवाल)। दीपावली पर घर-आंगन रोशन करने के साथ महिला आत्मनिर्भरता और गौसेवा को बढ़ावा देने की एक अनूठी पहल गुलाबी नगरी में आकार ले रही है। टोंक रोड, सांगानेर स्थित श्री पिंजरापोल गौशाला परिसर के सनराइज ऑर्गनिक पार्क में गाय के गोबर से पर्यावरण-अनुकूल दीपक तैयार किए जा रहे हैं। इस अभियान की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अब तक करीब 17 लाख दीपकों का उत्पादन और बिक्री हो चुकी है।
प्रतिदिन बन रहे 10 हजार दीपक
बढ़ती मांग को देखते हुए वर्तमान में प्रतिदिन करीब 10 हजार दीपकों का निर्माण किया जा रहा है। इन स्वदेशी दीपकों की गूंज देश के विभिन्न राज्यों यूपी, महाराष्ट्र, दिल्ली, केरल व कर्नाटक सहित 17 राज्यों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मॉरीशस तक पहुंच चुकी है।: इस वर्ष राजस्थान सहित 17 राज्यों में अब तक करीब 7 लाख दीपक और मॉरीशस में 10 लाख दीपकों की बड़ी खेप भेजी गई है। अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद के अंतरराष्ट्रीय संयोजक डॉ. अतुल गुप्ता ने बताया कि इस अभियान की सबसे खास बात यह है कि दीपकों के निर्माण से लेकर उनकी पैकेजिंग तक के सभी कार्यों की जिम्मेदारी महिलाओं को सौंपी गई है।
महिलाओं को उद्यमी बनाने का लक्ष्य
अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद की अंतरराष्ट्रीय सह-संयोजक एवं हैनीमैन चैरिटेबल मिशन सोसाइटी की सचिव मोनिका गुप्ता ने बताया कि इसका मुख्य उद्देश्य स्थानीय स्तर पर महिलाओं को रोजगार देकर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाना है। उन्होंने कहा, "गोबर आधारित कुटीर उद्योगों के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं और स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए रोजगार के नए अवसर विकसित किए जा रहे हैं। इसी के तहत टोंक, निवाई, बस्सी, मालपुरा, भरतपुर व जयपुर के कुल 10 महिला सहायता समूह की 100 से अधिक महिलाओं ने पिछले करीब छह माह में 17 लाख से ज्यादा दीपक व अन्य गोबर से निर्मित उत्पाद तैयार किए हैं। हमारा प्रयास महिलाओं को केवल कामगार नहीं, बल्कि भविष्य की सफल उद्यमी बनाना है।"
तेल रिसाव की समस्या से मुक्ति
आम परिवारों के बजट को ध्यान में रखते हुए इस बार पांच तरह के बेहद आकर्षक दीपक बनाए गए हैं। इन दीपकों की कीमत ₹5, 10, 15, 25 व ₹30 प्रति दीपक रखी गई है। इन दीपकों की खासियत यह है कि इन्हें एक विशेष निर्माण प्रक्रिया से तैयार किया गया है, जिससे दीपक में तेल का रिसाव नहीं होता और पात्र के जलने जैसी समस्याएं भी नहीं आती हैं।
गोबर से रोजगार, पर्यावरण संरक्षण का संदेश
गोबर को केवल कृषि उपयोग तक सीमित न रखकर उससे दीपक, जैविक खाद, धूपबत्ती, गमले, गौमाता, गणेश जी, आदियोगी, गणेश-लक्ष्मी जी, शुभ-लाभ, ओम, श्री, ब्रेसलेटव माला सहित अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा रहे हैं। इसी के तहत प्राकृतिक सामग्री से बने उत्पादों को बढ़ावा देने से प्लास्टिक आधारित सजावटी वस्तुओं पर निर्भरता कम करने में मदद मिल सकती है। उपयोग के बाद दीपकों के अवशेषों का उचित प्रबंधन भी जरूरी है। यदि उनमें कंपोस्टिंग के अनुकूल सामग्री का ही इस्तेमाल हुआ है, तो बाती, तेल और अन्य अनुपयुक्त सामग्री अलग करने के बाद अवशेषों को निर्धारित प्रक्रिया से जैविक खाद बनाने में उपयोग किया जा सकता है।
ग्रामीण उद्योगों को बढ़ावा देने की योजना
डॉ. अतुल गुप्ता ने बताया कि अखिल भारतीय गौशाला सहयोग परिषद से जुड़े लगभग 4,000 गौशालाओं के नेटवर्क के माध्यम से गोबर आधारित उत्पादों के निर्माण, प्रशिक्षण और विपणन की संभावनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है। उनका मानना है कि गौशालाओं को केवल गौवंश के आश्रय स्थल के रूप में नहीं, बल्कि ग्रामीण उद्योग, महिला रोजगार और कौशल विकास के केंद्र के रूप में भी विकसित किया जाना चाहिए।
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