El Niño: अलनीनो का बढ़ता असर! सौ सालों में तीसरा सबसे सूखा जून

महंगाई और कृषि संकट की बढ़ी चिंता, जानिए क्या कहते हैं विशेषज्ञ

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जलवायु परिवर्तन और प्रशांत महासागर में तेजी से पैर पसार रहे 'अलनीनो' देश-दुनिया की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अलनीनो के असर के चलते इस बार जून का महीना पिछले सौ वर्षों में तीसरा सबसे सूखा महीना दर्ज किया गया है। देश के अंदरूनी हिस्सों में मानसूनी हवाओं की रफ्तार काफी धीमी रही है, लेकिन मौसम वैज्ञानिकों का अनुमान है कि जुलाई के पहले सप्ताह से मानसून दोबारा रफ्तार पकड़ेगा और मध्य भारत सहित कई हिस्सों में अच्छी बारिश हो सकती है। अगर ये उम्मीद भी अधूरी रही तो आम आदमी की थाली पर महंगाई का बोझ बढ़ेगा। 

विशेषज्ञों के  अनुसार, भारत में इस साल जून माह में अलनीनो के प्रभाव के कारण मानसून की बारिश में सामान्य से 42 प्रतिशत की भारी कमी दर्ज की गई है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग और वैश्विक मौसम विज्ञानियों के अनुसार, प्रशांत महासागर में तेजी से सक्रिय हो रहा यह अलनीनो साल के अंत तक सुपर अलनीनो का रूप ले सकता है। आगामी महीनों में कमजोर मानसून और भीषण गर्मी का संकट गहराने की भी आशंका है। ऐसा हुआ तो इस अलनीनो का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर पड़ सकता है। मौसम विभाग ने इस सीजन (जून से सितंबर) में दीर्घावधि औसत की केवल 90 प्रतिशत बारिश होने का अनुमान भी जताया है।

मानसून की इस सुस्ती के पीछे कई वैश्विक और स्थानीय मौसमी बदलाव जिम्मेदार हैं। देशभर के कई हिस्सों में मानसून के समय पर न पहुंचने के पीछे मौसम विज्ञानियों ने कई कारण गिनाए हैं। पहला कारण है कि मानसून को आगे धकेलने के लिए बंगाल की खाड़ी में एक मजबूत कम दबाव वाले क्षेत्र की जरूरत होती है। इस बार ऐसा कोई प्रभावी सिस्टम नहीं बना, जिससे मानसूनी हवाओं की गति थम गई। दूसरा कारण है कि जून महीने की शुरूआत में उत्तर-पश्चिम भारत में कई पश्चिमी विक्षोभ सक्रिय रहे। इन हवाओं ने मानसूनी दक्षिण-पश्चिमी हवाओं के साथ खींचतान पैदा की, जिससे मानसून का प्राकृतिक प्रवाह बाधित हुआ।

तीसरा कारण है कि राजस्थान में बारिश लाने में अरब सागर से आने वाली नमी से भरी हवाओं की बड़ी भूमिका होती है। इस बार शुरूआती चरण में ये पश्चिमी हवाएं कमजोर रहीं, जिससे हवा में पर्याप्त नमी का स्तर नहीं बन पाया। चौथा कारण है कि मानसून की उत्तरी सीमा देश के पूर्वी और मध्य हिस्सों में करीब एक सप्ताह से अधिक समय तक एक ही जगह पर स्थिर रही, जिससे इसका उत्तर-पश्चिम की तरफ मूवमेंट रुक गया। 

वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि इस बार मानसून की धीमी चाल के पीछे अलनीनो का सीधा हाथ है। अलनीनो एक ऐसी वैश्विक मौसमी परिघटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में समुद्र की सतह का तापमान असामान्य रूप से बढ़ जाता है। जब प्रशांत महासागर में यह गर्मी बढ़ती है, तो यह वैश्विक वायुमंडल के चक्र को बदल देती है। इसके प्रभाव से भारत की ओर आने वाली मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं और बादलों के बनने की प्रक्रिया धीमी हो जाती है। 

असल में अलनीनो एक प्राकृतिक भौगोलिक घटना है, जिसमें प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से का पानी असामान्य रूप से गर्म हो जाता है। इस अत्यधिक गर्मी के कारण वैश्विक वायुमंडलीय परिसंचरण प्रभावित होता है, जिससे भारत की तरफ आने वाली नमी से भरी मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि अलनीनो वाले वर्षों में भारत में मानसूनी बारिश में भारी कमी आती है और सूखे की स्थिति पैदा होती है। आर्थिक विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि इस अलनीनो का असर केवल मौसम तक सीमित नहीं रहेगा। 

एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, इस अलनीनो चक्र के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को साल 2032 तक 94 लाख करोड़ रुपए से अधिक का संचयी आर्थिक नुकसान हो सकता है। वहीं खाद्य उत्पादन घटने से बाजारों में अनाज और सब्जियों की कीमतें बढ़ सकती हैं, जिससे आम आदमी पर महंगाई का बोझ और अधिक बढ़ेगा। साथ ही बिजली संकट की आशंका जताई गई है। माना जा रहा है कम बारिश के कारण देश के जलाशयों का स्तर घटेगा, जिससे हाइड्रो पावर (जलविद्युत) उत्पादन प्रभावित होगा और गर्मी के कारण बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच जाएगी। 

फिलहाल संभावित सूखे की स्थिति से निपटने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों ने पहले ही कमर कस ली है और इमरजेंसी तैयारियां भी शुरू कर दी हैं। सरकार ने देश के 150 से 200 से अधिक संवेदनशील जिलों की पहचान की है, जहां अलनीनो का असर सबसे खतरनाक हो सकता है। आकस्मिक फसल योजना के तहत कृषि मंत्रालय ने राज्यों को वैकल्पिक फसलों (कम पानी वाली फसलें या नकदी फसलें) की बुआई और आपातकालीन सिंचाई व्यवस्था तैयार रखने के निर्देश दिए हैं। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि मानसून के मुख्य महीने जुलाई और अगस्त होते हैं। यदि इन महीनों में सरकार द्वारा सुझाई गई कम अवधि और कम पानी की खपत वाली फसलों की किस्मों को किसान अपनाते हैं, तो इस संकट के प्रभाव को काफी हद तक कम किया जा सकता है। कुल मिलाकर हमें अलनीनो का सामना करने के लिए कमर कसकर तैयार रहना होगा।
डॉ. मोनिका शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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