ट्योढ़ी के लाल ने दुनिया में चमकाया बागपत का नाम, अब धान की भूसी से जैव ईंधन बनाने की राह दिखाई

सरकारी स्कूल से शुरू हुआ सफर, अमेरिका, जापान और सऊदी अरब तक मिली वैज्ञानिक प्रतिभा की पहचान; अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ महत्वपूर्ण शोध

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बड़ौत, सच कहूँ/डॉ संदीप दहिया। Baraut News: प्रतिभा किसी बड़े शहर या महंगे स्कूल की मोहताज नहीं होती, बल्कि दृढ़ संकल्प, मेहनत और लगन से गांव की मिट्टी में पला-बढ़ा इंसान भी पूरी दुनिया में अपनी पहचान बना सकता है। बागपत के ट्योढ़ी गांव के वैज्ञानिक डॉ. राम करण ने इस बात को सच साबित कर दिखाया है। सरकारी प्राथमिक विद्यालय से शिक्षा की शुरुआत करने वाले डॉ. राम करण ने अपनी वैज्ञानिक उपलब्धियों से न केवल गांव और जिले, बल्कि देश का नाम भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रोशन किया है। अब उन्होंने अपनी शोध टीम के साथ धान की भूसी से भविष्य में जैव ईंधन बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है।

धान की भूसी से ऊर्जा बनाने की नई उम्मीद

दिल्ली विश्वविद्यालय के दक्षिण परिसर में सूक्ष्मजीव विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राम करण और उनकी टीम ने ऐसे विशेष बैक्टीरिया की पहचान की है, जो धान की भूसी के कठोर रेशों को तोड़कर उनसे शर्करा निकालने में सक्षम हैं। इस शर्करा का इस्तेमाल भविष्य में जैव ईंधन बनाने के लिए किया जा सकता है। यह शोध कृषि अवशेषों के बेहतर उपयोग और स्वच्छ ऊर्जा के नए विकल्प विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

शोध के दौरान टीम ने केरल के समुद्री क्षेत्रों और दिल्ली की एक झील से 29 प्रकार के बैक्टीरिया अलग किए। इनमें कुछ बैक्टीरिया अधिक नमक और कठिन परिस्थितियों में भी सक्रिय पाए गए। प्रयोगशाला में इनकी मदद से उपचारित धान की भूसी से शर्करा प्राप्त करने में सफलता मिली। हालांकि, इस तकनीक से बड़े पैमाने पर जैव ईंधन का उत्पादन करने के लिए अभी और शोध की आवश्यकता है। यह महत्वपूर्ण शोध 28 अक्टूबर 2026 को स्विट्जरलैंड स्थित प्रकाशक की प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिका ‘फ्रंटियर्स इन माइक्रोबायोलॉजी’ में प्रकाशित हुआ है।

सरकारी स्कूल से आईआईटी दिल्ली और फिर दुनिया की नामी शोध संस्थाओं तक

डॉ. राम करण की सफलता की कहानी ग्रामीण क्षेत्र के विद्यार्थियों के लिए प्रेरणादायक है। उनकी प्रारंभिक शिक्षा ट्योढ़ी गांव के सरकारी प्राथमिक विद्यालय में हुई। इसके बाद उन्होंने सरूरपुर इंटर कॉलेज और बड़ौत के जाट कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की। अपनी मेहनत और प्रतिभा के बल पर उन्होंने आईआईटी दिल्ली से पीएचडी की उपाधि हासिल की। इसके बाद अमेरिका की प्रतिष्ठित शोध संस्थाओं और सऊदी अरब की किंग अब्दुल्ला विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी यूनिवर्सिटी में वैज्ञानिक अनुसंधान किया। विदेशों में लगभग 13 वर्ष तक काम करते हुए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक जगत में अपनी अलग पहचान बनाई।

अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों से बढ़ाया देश का गौरव

डॉ. राम करण को उनके वैज्ञानिक योगदान के लिए इटली में सर्वश्रेष्ठ वैज्ञानिक सम्मान, जापान में युवा वैज्ञानिक सम्मान और सऊदी अरब में उत्कृष्टता पुरस्कार सहित कई प्रतिष्ठित सम्मान मिल चुके हैं। उन्हें अमेरिकन सोसाइटी फॉर माइक्रोबायोलॉजी की अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप भी प्राप्त हुई है। विदेशों में लंबे समय तक वैज्ञानिक अनुसंधान करने के बाद वह भारत लौटे और दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन के साथ शोध कार्य शुरू किया। उनकी उपलब्धियां साबित करती हैं कि गांव से निकलकर भी विश्वस्तरीय वैज्ञानिक बनने का सपना साकार किया जा सकता है।

किसानों की मेहनत को उपयोगी बनाना है सपना

डॉ. राम करण का कहना है कि गांव में पले-बढ़े होने के कारण उन्होंने किसानों की मेहनत और उनकी चुनौतियों को करीब से देखा है। वह चाहते हैं कि उनका वैज्ञानिक शोध किसानों और देश के काम आए। उनका सपना है कि भविष्य में धान के दाने के साथ उसकी भूसी भी किसानों के लिए उपयोगी साबित हो और कृषि अवशेषों से ऊर्जा उत्पादन के नए रास्ते खुलें।

इस शोध में अंजलि गुप्ता, शुभम पांडे, अनन्या अग्रवाल, डॉ. अश्विनी चौहान और प्रो. कुओ-वेई हुआंग ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ट्योढ़ी के सरकारी स्कूल से शुरू होकर अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक मंच तक पहुंचा डॉ. राम करण का सफर बागपत के युवाओं और ग्रामीण विद्यार्थियों को संदेश देता है कि परिस्थितियां चाहे कैसी भी हों, मेहनत, लगन और ज्ञान के बल पर दुनिया में अपनी पहचान बनाई जा सकती है।

 

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