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    किसान को उसका हक मिलना चाहिए

    पिछले दिनों एक समाचार ने देश का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। यह समाचार महाराष्ट्र के एक किसान से जुड़ा था। महाराष्ट्र की सोलापुर मंडी में किसान राजेन्द्र तुकाराम चव्हाण अपनी प्याज की फसल बेचने गए थे। फसल का वजन पांच क्विंटल से थोड़ा ज्यादा था। जब मंडी में प्याज का भाव मात्र 1 रुपए किलो देने की बात हुई, तो किसान को पहला झटका लगा। फिर ट्रांसपोर्ट, मजदूरी, माल ढुलाई और आढ़ती की कमीशन निकाल कर किसान को मात्र 2 रुपए का चेक दिया गया। वह भी 15 दिन बाद का था। अर्थात 512 किग्रा प्याज की कुल कीमत मात्र 2 रुपए! ये जमीनी सच्चाई है कि आजादी के 75 वर्षों में कई दलों की सरकारें आई और गई लेकिन किसानों की हालत में जितना सुधार होना चाहिए था वो नहीं हो सका। लेकिन सच्चाई यह है कि किसान की आमदनी बढ़ना तो दूर किसान को फसल की लागत भी नसीब नहीं हो पा रही है। मुनाफा तो स्वप्न की बात ही है।

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    फरवरी 2016 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का वादा किया था। यह डेडलाइन खत्म हो चुकी है। प्रधानमंत्री की घोषणा के बाद 1984 बैच के आईएएस अधिकारी डॉ. अशोक दलवाई की अगुवाई में 13 अप्रैल 2016 को डबलिंग फार्मर्स इनकम कमेटी का गठन कर दिया गया। इसमें किसान प्रतिनिधि भी शामिल किए गए। दलवई कमेटी ने सितंबर 2018 में अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। आज पीएम किसान स्कीम के तौर पर जो 6000 रुपये मिल रहे हैं उनमें इस कमेटी की भी भूमिका है।

    किसानों की आय को लेकर नेशनल सैंपल सर्वे आर्गेनाइजेशन ने जो सबसे ताजा रिपोर्ट तैयार की है उसके मुताबिक भारत के किसान परिवारों की औसत मासिक आय 10,218 रुपये तक पहुंच चुकी है. लेकिन इसमें फसलों से होने वाली आय का योगदान महज 3,798 रुपये ही है। इसमें से भी 2,959 रुपये तो वो फसल उत्पादन पर ही खर्च कर देता है। यानी खेती से उसकी शुद्ध आय सिर्फ 839 रुपये प्रतिमाह है। प्रतिदिन का हिसाब लगाएं तो लगभग 28 रुपये। अब आप खुद अंदाजा लगाइए कि किसानों की दशा कैसी है। कुछ बड़े किसान फायदे में हो सकते हैं, लेकिन 86 फीसदी छोटे किसानों की आर्थिक स्थिति बहुत खराब है। उनकी आय सरकारी चपरासी जितनी भी नहीं है।

    प्याज की तरह कहानी तेलंगाना में टमाटर किसानों की है। किसान कह रहे हैं कि जितना चाहिए, टमाटर तोड़ कर ले जाएं। प्याज, टमाटर के अलावा आलू ने भी यही क्रूर यथार्थ झेला है। कुछ और सब्जियों की भी यही नियति होगी! इन परिस्थितियों में किसान आत्महत्या नहीं करेगा, तो उसके सामने विकल्प क्या है? किसान अपने टै्रक्टर तले फसलों को रौंद रहे हैं या सडकों पर फेंक रहे हैं। यह प्याज, टमाटर की बर्बादी नहीं है, बल्कि अर्थव्यवस्था को कुचलना है। प्याज किसान की आय 2 रुपए ही नहीं है। यह प्रतीकात्मक आंकड़ा है कि किसानी कितनी सस्ती है या कृषि की मंडी कितनी क्रूर है! हम और भारत सरकार बखूबी जानते हैं कि किसानी के बाजार में बिचौलियों का कितना दबदबा है! केंद्रीय खाद्य मंत्री रहते हुए रामविलास पासवान ने इस आशय का बयान देकर सरकार को चौंका दिया था। आज वह हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन एक और क्रूर यथार्थ सामने आया है।

    एक पक्ष यह भी है कि किसानों की आमदनी अगर बढ़ी है तो खेती पर खर्च भी तेजी से बढ़ रहा है। नवंबर 2021 में सरकार ने बताया था कि हर महीने 10,218 रुपये कमाते हैं तो 4,226 रुपये खर्च हो खर्च हो जाते हैं। किसान हर महीने 2 हजार 959 रुपये बुआई और उत्पादन पर तो 1 हजार 267 रुपये पशुपालन पर खर्च करता है। यानी, किसानों के पास हाथ में 6 हजार रुपए भी पूरे नहीं आते। इतनी कम कमाई के चलते ही किसान कर्ज लेने को मजबूर हो जाता है। साल 2021 में वित्त मंत्रालय ने बताया था कि 31 मार्च 2021 तक किसानों पर 16.80 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा का कर्ज बकाया है। उस समय वित्त मंत्रालय ने यह भी साफ कर दिया था कि किसानों की कर्ज माफी करने का फिलहाल कोई प्रस्ताव नहीं है।

    भारत में प्याज की 150 लाख टन से ज्यादा की खपत है और उत्पादन 200 लाख टन से ज्यादा हुआ है। इसके बावजूद प्याज आयात किया जाता रहा है। हम इस धंधे को समझ नहीं पाए हैं। फिलीपींस में 3512 रुपए किलो प्याज बिक रहा है। अमरीका में 240, दक्षिण कोरिया में 250, ताइवान और जापान में 200, कनाडा में 190 और सिंगापुर में 180 रुपए प्रति किलो प्याज बिक रहा है। यदि हम अपने ही खुदरा बाजार की बात करें, तो औसतन 30-35 रुपए के दाम हैं। तो फिर किसान को उसकी फसल के सही भाव क्यों नहीं दिए जा रहे?

    देश के अधिकतम औसत आय वाले पहले पांच राज्यों में दो राज्य पूर्वोत्तर के हैं। देश में किसानों की न्यूनतम मासिक आय वाला राज्य झारखंड है जहां किसानों की मासिक आय मात्र 4,895 रुपये है। यानी राष्ट्रीय औसत से भी लगभग आधी। ओडिशा में 5,112 रुपये, पश्चिम बंगाल में 6,762 रुपये और बिहार में 7,542 रुपये मासिक है। देश के दस राज्यों में किसानों की मासिक आय राष्ट्रीय औसत आय यानी 10,218 रुपये से भी कम है। तो कुछ राज्यों में राष्ट्रीय औसत आय से नाम मात्र ज्यादा है। उदाहरण के तौर पर उत्तर प्रदेश में किसानों की औसत आय 8,061 रुपये है। यानी वर्ष 2015-16 राष्ट्रीय औसत से मात्र 3 रुपये की वृद्धि हुई और फिलहाल की राष्ट्रीय औसत से 2,157 रुपये कम है। ये आंकड़े बता रहे हैं कि देश के किसानों की स्थिति बदहाल है।

    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने किसानों की आय दोगुनी करने के लिए जून 2018 में राज्यपालों की हाई पावर कमेटी भी गठित की थी। यूपी के तत्कालीन राज्यपाल राम नाईक इसके अध्यक्ष बनाए गए थे। कमेटी ने अक्टूबर 2018 में अपनी रिपोर्ट तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को सौंप दी थी। रिपोर्ट में 21 सिफारिशें की गईं थीं। इसमें मनरेगा को कृषि से जोड़ने की बात भी थी, जिसका किसान संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं। साथ ही जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को देखते हुए विशेष कृषि जोन बनाकर वहां की जलवायु के मुताबिक खेती को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया था। लेकिन यह रिपोर्ट अब तक लागू नहीं हुई।

    भारत में किसान की औसत आय 27 रुपए रोजाना की है। यह नीति आयोग का तथ्य है। माहवार आय भी 4500 रुपए के करीब है। किसान 5500-6000 रुपए मजदूरी बगैरह करके कमाता है। क्या कृषि के मौजूदा बाजार के व्यवहार से स्पष्ट है कि किसान को किसानी छोड़ने पर विवश किया जा रहा है? क्या सरकार और मंडी किसानों को आंदोलन की सजा दे रही है? सरकार प्याज और टमाटर के भी भाव तय क्यों नहीं कर रही कि उससे कम पर फसल बिकेगी ही नहीं। किसानों को मंडी के बजाए विदेश में निर्यात क्यों नहीं करने दिया जा रहा? और आयात की क्या जरूरत है, जब नैफेड के कोल्ड स्टोरेज या गोदामों में प्याज भरा रखा होता है? बेहद पेचीदा नीतियां हैं सरकार की! विडंबना यह भी है कि सरकार उद्योगों में पूंजी निवेश करती है, लेकिन किसानी को कुदरत और मौसम के भरोसे छोड़ देती है। बेल-आउट पैकेज भी उद्योगों के लिए हैं। यह मेहरबानी खेती पर नहीं है। जब देश आजादी का ‘अमृतकाल’ मना रहा है तो सरकार को किसानों की आय दोगुनी करने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ाने चाहिएं।                                                                                                     राजेश माहेश्वरी, वरिष्ठ लेखक एवं स्वतंत्र टिप्पणीकार (यह लेखक के अपने विचार हैं)

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