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    फल-सब्जियों पर भी कोरोना का कहर

    Fruits-and-Vegetables sachkahoon

    भाव नहीं मिलने से बर्बादी के कगार पर धरतीपुत्र

    • माटी के मोल बेचने को मजबूर

    सच कहूँ/गुरजंट धालीवाल, जयपुर। कोरोना महामारी की दूसरी लहर देश में कहर बरपा रही है। कोरोना संक्रमण को रोकने के लिए लगाए गए लॉकडाउन से कारोबार और आजीविका को तगड़ा झटका लगा है। इनमें एक वर्ग वो भी है जो देश में फल, सब्जी की खेती से जुड़ा कारोबार करता है। पेरिसेबल आइटम (जल्द खराब होने वाली चीजों) को लेकर लगातार दूसरा साल है, जब किसानों को उनकी उपज के दाम नहीं मिल रहे हैं। हालांकि फल-सब्जियों के निर्यात की बात करें तो कोरोना आपदा को कृषि सेक्टर ने इसे अवसर में तब्दील कर दिया। पिछले साल 2020 में ही मात्र चार माह में 25 हजार करोड़ का कृषि निर्यात हुआ। एपीडा ने वर्ष 2022 तक कृषि निर्यात को 40 बिलियन डॉलर से बढ़ाकर 60 बिलियन डॉलर तक ले जाने का टारगेट तय किया है।

    इस बार भी भले ही कृषि सेक्टर को लॉकडाउन से मुक्त रखा गया है, लेकिन धरतीपुत्र के लिए कृषि उत्पाद बेच पाना बेहद मुश्किल हो रहा है। बड़े शहरों व अन्य राज्यों में फल व सब्जियां नहीं ले जा पाने के कारण किसानों को उचित भाव नहीं मिल पा रहे हैं। ऐसे में उन्हें स्थानीय मंडियों में माटी के मोल फल-सब्जियां बेचने को मजबूर होना पड़ रहा है। हालात ये हैं कि मजदूरी तो दूर फसल का लागत मूल्य भी नहीं मिल पा रहा है। आइए, हम आपको ऐसे किसानों से रूबरू करवाते हैं जो कि अपनी फसल को माटी के मोल बेचने के लिए मजबूर हैं।

    तरबूज के नहीं मिले भाव, हुआ चार लाख का घाटा

    हरदा (मध्यप्रदेश) निवासी हरिओम पटवारी ने इस साल 12 एकड़ तरबूज की फसल बोई। इसके लिए कुल 9 लाख रुपए की लागत आयी, जिसमें से बैंक से 4 लाख लोन लेना पड़ा। पैदावार बंम्पर हुई लेकिन अन्य राज्यों में तरबूज नहीं भेज पाए जिसके चलते स्थानीय मंडी में भाव 250 रुपए प्रति क्विंटल ही मिला। इससे महज 2400 क्विंटल के करीब 5 लाख रुपए ही मिले, जिससे लगभग 4 लाख रुपए घाटा हो गया।

    लागत भी नहीं मिली तो टमाटर ही नहीं तोड़े

    जयपुर जिले के पेमाराम जाट ने एक एकड़ में टमाटर की फसल बोई थी। कोरोना के कारण लेबर 400 रुपए हो गई, जबकि मंडी में टमाटर के भाव 3-5 रुपए प्रति किलो हैं। जितना टमाटर एक मजदूर दिनभर में तोड़ता है उतनी लेबर का ही बिकता है। लागत मूल्य भी नहीं मिल पाने के कारण पेमाराम ने टमाटर तुड़वाये ही नहीं।

    औने-पौने दामों में बेचने को मजबूर खीरा

    जयपुर जिले के गांव कालख निवासी गंगाराम सेपट पिछले कई वर्षों से खीरा, लौकी, काचरी, ब्रोकली, बैंगन इत्यादि सब्जियों की खेती कर रहे हैं। पिछले सीजन में उन्होंने 9 लाख रुपए का मुनाफा कमाया था। इस बार लॉकडाउन की वजह से खीरा 10 से 12 रुपए, लौकी 5-7 रुपए, काचरी 10 रुपए प्रति किलो के हिसाब से बेचा। इस सीजन में 15 लाख की लागत की एवज में 12 लाख रुपए ही मिले यानी करीब तीन लाख का घाटा हुआ है।

    लॉकडाउन से मजदूरी भी महंगी

    प्याज उत्पादक राज्य महाराष्ट्र के नासिक इलाके में बड़े पैमाने पर प्याज की खुदाई हो रही है, लेकिन किसानों के सामने मजदूरी की समस्या है। नासिक जिले में सटाणा तहसील के अभिजीत बताते हैं, यहां ज्यादातर लेबर गुजरात से आती है इस बार नहीं आ रही है। इस कारण न केवल मजदूर कम मिल रहे हैं बल्कि जो मिल रहे हैं उन्हें मजदूरी ज्यादा देनी पड़ रही है। लॉकडाउन के चलते समस्या सिर्फ सब्जी और फल किसानों को ही नहीं है। महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब हरियाणा में किसान अलग-अलग समस्याओं से जूझ रहे हैं।

    326.58 मिलियन टन उत्पादन का अनुमान

    भारत में फल और सब्जियों के उत्पादन में चीन के बाद विश्व में दूसरे स्थान पर है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय ने 2020-21 में सब्जियों का उत्पादन 193.61 मिलियन टन का अनुमान जताया है। जबकि साल 2019-20 में 188.91 मिलियन टन था। देश में 2020-21 में 10.71 मिलियन हेक्टेयर में सब्जियों की खेती हो रही है, जबकि 2019-20 में 10.30 हजार हेक्टेयर रकबे में खेती हुई थी।

    7512 करोड़ के फल-सब्जियां निर्यात

    एपिडा के चेयरमैन डॉ. एम. अंगामुथु के मुताबिक, प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के निर्यात में बढ़ोतरी का यह रुझान वित्त वर्ष 2021-22 में भी जारी रहने का अनुमान है। अप्रैल-2020 से फरवरी-2021 तक 2846 करोड़ रुपए की 335229 मीट्रिक टन प्रसंस्कृत सब्जियां व 4666 करोड़ रुपए के 485181 मीट्रिक टन प्रसंस्कृत फल एवं ज्यूस का निर्यात हुआ। भारत से फलों में आम, अखरोट, अंगूर, केला, अनार जबकि सब्जियों में प्याज, भिंडी, करेला, हरी मिर्च, मशरूम और आलू का अधिक योगदान है।

    भारतीय फल और सब्जियां मुख्यत: संयुक्त अरब अमीरात, श्रीलंका, नीदरलैंड, बांग्लादेश, मलेशिया, नेपाल, यूनाइटेड किंगडम, सउदी अरब और कतर को भेजी जाती हैं। यदपि विश्व बाजार में भारत का अंशदान लगभग एक प्रतिशत ही है फिर भी देश से बागवानी उपज की स्वीकार्यता तेजी से बढ़ रही है।

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