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    सच कहूँ की 19वीं वर्षगांठ : मानवीय मूल्यों की स्थापना ही उद्देश्य

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    प्रिय पाठकों | अज ‘सच कहूँ’ अपनी स्थापना के 19 वर्ष पूरे कर चुका है। पूज्य हजूर पिता संत डॉ. गुरमीत राम रहीम सिंह जी इन्सां की पावन प्रेरणा से 11 जून 2002 को अर्धसाप्ताहिक के रूप में सरसा (हरियाणा) से ‘सच कहूँ’ की शुरूआत हुई जो अब देश के सात राज्यों में दो भाषाओं (हिन्दी+पंजाबी) में लाखों पाठकों की पसंद बन चुका है। ‘सच कहूँ’ बदलती दुनिया के साथ डिजीटल फारमेट में वेब पोर्टल, ई-पेपर, यू-ट्यूब, फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम के माध्यम से देश-विदेश के लाखों पाठकों तक पहुंच रहा है। ‘सच कहूँ’ का एकमात्र उद्देश्य है कि समाज में मानवीय मूल्यों दया, अहिंसा, प्रेम, सदाचार, सहयोग, सेवा, पर्यावरण संरक्षण का प्रसार-प्रचार हो एवं समाज से अंधविश्वास, नशाखोरी, वेश्यावृत्ति, भ्रष्टाचार, प्रदूषण आदि का विनाश हो।

    ‘सच कहूँ’ का स्व संकल्प है कि भ्रामक, मिथ्या, नफरत भरे समाचारों, आलेखों, विज्ञापनों से किसी भी पाठक की आर्थिक या मानसिक क्षति न हो, अत: ‘सच कहूँ’ सदैव साफ-सुथरी मानवीय मूल्यों से भरपूर पत्रकारिता का पक्षधर है। ‘सच कहूँ’ दुनिया का एकमात्र अखबार है, जो प्रतिदिन अपने मुख्य पृष्ठ पर यह प्रकाशित करना नहीं भूलता कि ‘आज के दिन सबसे बढ़िया काम किसने किया’।

    ‘सच कहूँ’ ने अपने अभी तक के जीवन काल में कई मुश्किल परिस्थितियों का भी सामना किया, परन्तु इसके सुधि पाठकों के भरपूर स्नेह एवं ‘सच कहूँ’ टीम की कर्मठता के बल पर सतगुरू जी की कृपा से उन कठिन लम्हों से आगे बढ़कर मानवता की सेवा में सदैव अग्रणी रहा है। अभी कोरोना की महामारी में ‘सच कहूँ’ के अथक मेहनती एवं समर्पित कई साथियों ने कर्तव्य निर्वाह करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे दी है, ‘सच कहूँ’ उनकी सेवाओं का सदैव ऋणी रहेगा। ‘सच कहूँ’ प्रण करता है कि वह सामाजिक उत्थान के उद्देश्यों को जारी रखते हुए मानवता एवं राष्टÑ की सेवा में सदैव समर्पित रहेगा।
    -संपादक

    मैं ‘सच कहूँ’
    अखबार हूं
    अन्याय का प्रतिकार हूं
    ज्योति का आगार हूं
    न्याय के लिए लड़ता
    मैं ‘सच कहूं’ अखबार हूं।
    सच का दर्पण हूं
    निश्छल प्रेम समर्पण हूं
    पत्रकारिता धर्म है मेरा
    निष्पक्षता नियम है मेरा
    झूठों के लिए ललकार हूं
    मैं ‘सच कहूं’ अखबार हूं।
    निर्धनों की आवाज हूं
    अंत नहीं आगाज हूं
    घोर तिमिर का वक्ष चीरती
    बुझता दिया नहीं मशाल हूं
    सियासी समरांगण में
    पाञ्चजन्य हुंकार हूं
    मैं ‘सच कहूं’ अखबार हूं।
    खबरों के आर-पार हूं
    जन-जन का विश्वास हूं
    धर्म की ध्वजा फहराता
    मानवता का प्रकाश हूं
    हर हलचल से खबरदार
    गुरु आशीष का उपहार हूं
    मैं ‘सच कहूं’ अखबार हूं।
    -देवेन्द्रराज सुथार

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