कोमल सांखला। एक छोटे से गांव में स्वीटी नाम की एक प्यारी-सी लड़की रहती थी। स्वीटी ने अभी-अभी स्कूल जाना शुरू किया था। पहले तो वह डरती थी। ‘स्कूल में तो बस किताबें पढ़नी पड़ेंगी, लिखना पड़ेगा। खेलना कौन सिखाएगा?’ वह अपनी मां से कहती। लेकिन स्वीटी का स्कूल जादुई था। वहां टीचर आंटी सब कुछ खेल-खेल में सिखाती थीं। पहले दिन स्वीटी क्लास में घुसते ही चौंक गई। कक्षा में कोई बेंच-टेबल नहीं थे। बच्चे जमीन पर चटाई बिछाकर बैठे थे। टीचर आंटी ने कहा, ‘आज हम अक्षरों का खेल खेलेंगे!’
सब बच्चों ने हंसते-हंसते एक सर्कल बनाया। आंटी ने एक गेंद दी। गेंद पकड़ने वाला बच्चा ‘अ’ कहता और अगले को गेंद फेंकता। अगला ‘आ’ बोलता। स्वीटी को गेंद मिली तो वह चिल्लाई, ‘इ!’ सब हंस पड़े। खेलते-खेलते ‘अ’ से ‘ज्ञ’ तक के अक्षर सीख गए। स्वीटी सोचने लगी, ‘अरे वाह! पढ़ाई तो खेल बन गई!’ अगले दिन गणित का समय आया। टीचर आंटी ने कहा, ‘चलो, बाजार का खेल खेलें!’ बच्चे दो ग्रुप में बंट गए। एक ग्रुप दुकानदार बना, दूसरा ग्राहक। स्वीटी दुकानदार बनी।
‘दो सेब दो रुपये के, चार सेब कितने?’ ग्राहक ने कहा, ‘आठ रुपये!’ गलत जवाब पर सब हंसते, और सही करने पर ताली बजाते। खेल खत्म होने पर सब जोड़-घटाव सीख चुके थे। स्वीटी घर लौटकर मां को बोली, ‘मां, स्कूल में गणित बाजार खोलकर सिखाया!’ धीरे-धीरे स्वीटी को स्कूल इतना पसंद आने लगा कि वह रोज उत्साहित हो जाती। कभी जानवरों के नाम सीखने के लिए ‘शेर-हाथी’ का नाटक होता। स्वीटी शेर बनी, दहाड़ती—‘मैं शेर हूं, जंगल का राजा!’ सबको जानवरों के नाम और उनकी आवाजें याद हो जातीं। कभी रंगों का खेल होता—लाल सेब ढूंढो, नीला आकाश दिखाओ। स्वीटी की सहेली रानी पहले स्कूल से डरती थी। स्वीटी ने उसे गली में बुलाया- ‘देख रानी, स्कूल में ऐसे खेल होते हैं! आ जा न!’ एक दिन गली के बच्चे इकट्ठा हुए। स्वीटी ने कहा, ‘चलो, घर पर भी खेल-खेल में पढ़ाई करें!’
सबने सर्कल बनाया, गेंद घुमाई और अक्षर बोले। फिर पेड़-पौधों का खेल हुआ- ‘यह पेड़ कौन सा है? पत्ते गिनो!’ छोटू ने कहा, ‘नीम का पेड़, दस पत्ते!’ सब खुश हो गए। रानी बोली, ‘स्वीटी, तुम्हारा स्कूल कमाल का है। खेल-खेल में सब सीख जाते हैं।’ लेकिन एक समस्या आ गई। गांव के कुछ बड़े लोग कहने लगे, ‘स्कूल में खेल? यह कैसी पढ़ाई है? किताबें खोलो!’ स्वीटी उदास हो गई। उसने टीचर को बताया। आंटी मुस्कुराईं- ‘चिंता मत करो, हम सबको समझा देंगे।’ अगले दिन पेरेंट्स मीटिंग हुई। बच्चों ने आगे आकर अपने-अपने खेल दिखाए। स्वीटी ने गेंद वाला अक्षर खेल दिखाया। छोटू ने बाजार का खेल समझाया। सब माता-पिता दंग रह गए—‘वाह! बच्चे खुश भी हैं और सीख भी रहे हैं!’ टीचर आंटी ने समझाया, ‘बच्चों का दिमाग खेल में ज्यादा लगता है। खेल से चीजें जल्दी याद रहती हैं। आजकल दुनिया भर में ‘प्ले-वे मेथड’ अपनाया जा रहा है। भारत में भी एनसीईआरटी इसे बढ़ावा देता है। इससे बच्चे एक्टिव और क्रिएटिव बनते हैं।’ सब सहमत हो गए। स्वीटी ने ताली बजाई—‘हिप-हिप हुर्रे!’ अब स्वीटी गली के सभी बच्चों को स्कूल बुलाती है- ‘आओ, खेलो और सीखो!’ सब कहते, ‘हां स्वीटी दीदी, खेल-खेल में पढ़ाई सबसे मजेदार है!’ स्वीटी समझ गई—स्कूल सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं, बल्कि जिंदगी का एक खूबसूरत खेल है।














