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    सिर्फ शोर-शराबा ही विरोध नहीं

    Parliament Monsoon Session

    गत दिवस महाराष्ट्र विधान सभा में हुए हंगामे के बाद भाजपा के 12 विधायकों को एक वर्ष के लिए सदन से निलंबित कर दिया गया। सभी विधायकों पर स्पीकर का अपमान करने का आरोप लगा है। यह निर्णय आश्चर्यचकित व चिंताजनक है। गत दिवस सुप्रीम कोर्ट ने भी संसद और विधान सभाओं में शोर-शराबे पर चिंता जताई थी। दरअसल लोकतंत्र में विधायक/सांसदों को अधिकार है कि वे जनता के मुद्दों पर अपनी बात रख सकते हैं और सरकार की कमजोरियों को सामने लाएं, लेकिन विरोध करने के तरीके में बड़ा अंतर आ गया है। कई बार तो स्पीकर के मान-सम्मान का ध्यान भी नहीं रखा जाता। स्पीकर की तरफ कागज फेंके जाते हैं। कई बार गाली-गलौच और तोड़फोड़ की घटनाएं भी घट चुकी हैं। दरअसल सख्त नियमों की कमी के कारण इस प्रकार के विरोध हो रहे हैं। राजनीति में भी धारणा बन गई है कि जितना ज्यादा हंगामा करोगे उतना ही उसे पार्टी का मजबूत नेता समझा जाता है।

    ज्यादा हंगामा करने वाले नेता को पार्टी में स्टार प्रचारक का दर्जा भी दिया जाता है। लोगों के चुने हुए जनप्रतिनिधि होने के कारण सदन की मर्यादा भंग करने वालों को अधिकतर 5-7 दिनों के लिए सदन की कार्रवाई से निलंबित कर दिया जाता है। कई बार स्पीकर सदस्यों के चुने होने के कारण उनके सम्मान का ध्यान रखते हुए निलंबन के दिन पूरे होने से पहले ही बहाल कर देते हैं। सख्त नियम न होने के कारण सदन के सदस्य कुछ भी अनाप-शनाप बोल देते हैं। इस चलन को रोकना जरूरी है। हैरानी इस बात की है कि सत्ता में आने पर हर राजनीतिक पार्टी विपक्षी दलों को मर्यादा, सहयोग व जिम्मेवारी से सदन की कार्रवाई चलाने का ज्ञान बांटती हैं लेकिन सत्ता से बाहर होने पर विरोधी पार्टी भी वही सबकुछ करती है जिसे वह गलत समझती है।

    संसद की कार्रवाई में रूकावट पैदा करने से करोड़ों रुपये का नुक्सान होता है। विकास के प्रोजैक्ट्स पर अपेक्षित चर्चा नहीं हो पाती, जिस कारण काम प्रभावित होते हैं और लोगों को जिन योजनाओं का लाभ मिलना होता है, जनता उससे वंचित हो जाती है। इस हंगामे के कारण कई महत्वपूर्ण बिल दशकों तक लटक जाते हैं। एक दिन में होने वाला काम 20-25 वर्षों तक पैडिंग में चले जाते है। महिलाओं के लिए राजनीति में 33 प्रतिशत आरक्षण बिल इसकी मिसाल है। दरअसल यह समस्या तब तक रहेगी जब तक राजनीति में स्वार्थ, मौकाप्रस्ती व विवेकहीनता समाप्त नहीं होती। संसद विचारों व बहस की जगह है, जिसे जंग की जगह नहीं बनने देना चाहिए। हंगामे के कारण संसद की मर्यादा को ठेस पहुंची है। सदन की मर्यादा का सम्मान करने से ही देश आगे बढ़ेगा। इस संबंधी संसद व विधान सभा के लिए सख्त नियम बनाने के साथ-साथ पार्टियों को अच्छी राजनीतिक संस्कृति पैदा करनी होगी।

     

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