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    जब अंग्रेज महिला भारत की आजादी के लिए लड़ी

    British women

    भारत से लगाव रखने वाली एनी बेसेंट का जन्म एक अक्टूबर 1847 को लंदन में हुआ था। पति से अलग होने के पश्चात एनी ने न केवल लंबे समय से चली आ रही धार्मिक मान्यताओं बल्कि पारंपरिक सोच पर भी सवाल उठाने शुरू किए। बल्कि उन्होंने चर्च पर हमला करते हुए उसके काम करने के तरीकों और लोगों की जिंदगियों को वश में करने के बारे में लिखना शुरू किया। उन्होंने विशेष रूप से धर्म के नाम पर अंधविश्वास फैलाने के लिए इंग्लैंड के एक चर्च की प्रतिष्ठा पर तीखे हमले किए थे। बस यहीं से ईसाई धर्म के प्रति उनका लगाव कम होता गया। भारतीय थियोसोफिकल सोसाइटी के एक सदस्य की मदद से वो साल 1893 में भारत पहुंचीं।

    उन्होंने पूरे भारत का भ्रमण किया। यहां उन्होंने देखा कि कैसे ब्रिटिश हुकूमत भारतीयों को शिक्षा, स्वास्थ्य या अन्य जरूरी चीजों से दूर रखती है। एनी ने भारतीयों के दर्द को समझा और इसके खिलाफ आवाज उठाई। वह भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में भी शामिल हुईं और वर्ष 1916 में होम रूल लीग जिसका उद्देश्य भारतीयों द्वारा स्वशासन की मांग था। सन 1917 में वो भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनीं।

    इस पद को ग्रहण करने वाली वह प्रथम महिला थीं। उन्होंने न्यू इंडिया नामक समाचार पत्र प्रकाशित किया जिसमे उन्होंने ब्रिटिश शासन की आलोचना की और इस विद्रोह के कारण उन्हें जेल जाना पड़ा। गांधी जी के भारतीय राष्ट्रीय मंच पर आने के पश्चात, महात्मा गांधी और एनी बेसेंट के बीच मतभेद पैदा हुए जिस वजह से वह धीरे-धीरे राजनीति से अलग हो गईं। हालांकि एक अंग्रेज के तौर पर भारत के पक्ष में खड़े होकर अंग्रेजों के खिलाफ ही लड़ना उनकी हिम्मत का परिचय था। 20 सितम्बर 1933 को मद्रास में एनी बेसेंट का देहांत हो गया। उनकी इच्छा के अनुसार उनकी अस्थियों को बनारस में गंगा में प्रवाहित कर दिया गया।

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