30 साल से मटके बेच रहीं लीलावती
हनुमानगढ़। जिले में लगातार बढ़ते तापमान और लू के प्रकोप के बीच लोगों का रुझान एक बार फिर पारंपरिक और प्राकृतिक साधनों की ओर बढ़ता नजर आ रहा है। भीषण गर्मी से राहत पाने के लिए आमजन अब फ्रिज के बजाय मिट्टी के मटकों का ठंडा पानी पसंद कर रहे हैं। यही वजह है कि शहर के बाजारों में इन दिनों मटकों की मांग तेजी से बढ़ गई है, लेकिन मांग के मुकाबले आपूर्ति कम पड़ने से विक्रेताओं को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। Hanumangarh News
जंक्शन की धानमंडी के पास पिछले करीब 30 वर्षांे से मटके बेच रही लीलावती ने बताया कि हर साल गर्मी के मौसम में मटकों की बिक्री बढ़ती है, लेकिन इस बार मांग में अचानक ज्यादा उछाल देखने को मिला है। हालत यह है कि ग्राहकों की मांग के अनुसार मटके उपलब्ध नहीं हो पा रहे। उन्होंने बताया कि मटके और अन्य मिट्टी के बर्तन वे गुजरात, महाजन, बीकानेर व सूरतगढ़ से मंगवाती हैं। एक बार में करीब 250 मटकों की खेप आती है, जिसका किराया लगभग 8 हजार रुपए लगता है। खरीद के हिसाब से छोटा मटका करीब 160 रुपए और बड़ा मटका 190 रुपए में पड़ता है।
कारोबार में नुकसान का जोखिम भी बना रहता है
हालांकि इस कारोबार में नुकसान का जोखिम भी बना रहता है। परिवहन के दौरान कई मटके टूट-फूट जाते हैं, वहीं ग्राहक मामूली लीकेज होने पर भी मटका वापस कर देते हैं। इसके अलावा ग्राहक सस्ते दाम में मटका देने का दबाव भी बनाते हैं, जिससे मुनाफा प्रभावित होता है। लीलावती ने बताया कि उनके पास मटकों के अलावा कैंपर, तंदूर, दही जमाने व सब्जी बनाने की हांडी, आटा गूंथने की परांत, कप-गिलास सहित कई प्रकार के मिट्टी के बर्तन उपलब्ध हैं। साथ ही पशुओं के लिए कुंडे व परांत तथा पक्षियों के लिए परिंडे भी तैयार करवाए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि मटके का पानी स्वास्थ्य के लिए लाभकारी होता है। पहले हर घर में मटका होता था और लोग इसी का पानी पीते थे, लेकिन अब आधुनिक साधनों के कारण यह परंपरा कम हो गई थी। हालांकि बढ़ती गर्मी के साथ लोग फिर से प्राकृतिक और पारंपरिक विकल्पों की ओर लौट रहे हैं। मटकों की बढ़ती मांग यह संकेत दे रही है कि लोग न सिर्फ गर्मी से राहत के लिए बल्कि स्वास्थ्य और पर्यावरण के प्रति जागरूकता के चलते भी मिट्टी के बर्तनों को अपनाने लगे हैं। Hanumangarh News















