Colonial

औपनिवेशिकता की बेड़ियां तोड़ने का वक्त

 हवा में रहेगी मेरे ख्याल की खुशबू, ये मुश्ते-खाक फानी (शरीर नश्वर) है, रहे, रहे न रहे। यह शेयर भगत सिंह ने अपनी फांसी के 20 दिन पूर्व यानी 3 मार्च 1931 को अपने छोटे भाई कुलतार सिंह को लिखे एक पत्र में लिखा था। लेकिन, विडंबना है कि देश की आजादी के लिए हंसते-हंसते […]
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