दल बदल राजनीतिक सिद्धांतों एवं मूल्यों का मजाक

Politics on Issue

सत्ता का मोह, सत्ता भोगने का लालच, जितने वाले दलों के प्रति आकर्षण, मंत्री पद मिलने के लुभावने वादे- ऐसे कारण हैं जो दलबदल के बाजार को गर्म करते हैं। चुनाव में जिस राजनीतिक दल का पलड़ा भारी दिखता है, उसमें घुसने की होड़ कुछ अधिक देखी जाती है। इनदिनों उत्तर प्रदेश और पंजाब में जमकर उठापटक हो रही है। स्थिति को देख विभिन्न दलों से नेता एक-दूसरी पार्टी में जा रहे हैं। ऐसा लगता है देश में लोकतांत्रिक मूल्यों को बनाए रखना राजनीतिक दलों एवं नेताओं का लक्ष्य नहीं है। विधानसभा चुनाव वाले राज्यों में दलबदल का सिलसिला कायम हो जाने पर हैरान होने वाली कोई बात नहीं, यह चुनावी मौसम का बुखार है जो चुनावों के दौरान हर दल के नेताओं को चढ़ता ही है, यह तय है कि आने वाले दिनों में उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड से लेकर गोवा, मणिपुर और पंजाब तक में यह सिलसिला और तेज होगा।

दलबदल की इस बीमारी का कोई इलाज नहीं, यह लोकतंत्र को कमजोर एवं अस्वस्थ करने वाली एक महाबीमारी है। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि राजनीतिक दल अपने राजनीतिक स्वार्थों के लिये खुद इसे बढ़ावा देते हैं। कई बार तो वे दूसरे दलों के नेताओं को अपने दल में इसलिए भी लाते हैं, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि उनके पक्ष में हवा चल रही है। यह बात और है कि इसके आधार पर यह अनुमान लगाना मुश्किल होता है कि कौन दल बढ़त हासिल करने जा रहा है, क्योंकि अक्सर नेता अपना टिकट कटने के अंदेशे में पाला बदलते हैं। विचारधारा उनके लिए कपड़े की तरह होती है। लोकतंत्र में सत्ता पाने का प्रयत्न एकान्तत: बुरा नहीं है पर लोकतांत्रिक मर्यादा, नैतिकता एवं सिद्धांतवादिता को दूर रखकर सत्ता पाने का प्रयत्न लोकतंत्र का कलंक है। आज की दूषित राजनीति में राष्ट्रहित एवं जनहित की महत्वाकांक्षा व्यक्तिहित एवं पार्टीहित के दबाव के नीचे बैठती एवं दबती जा रही है। सत्ता के स्थान पर स्वार्थ आसीन हो रहा है। दल बदल पुराना नासूर है। वर्ष 1977 और 1989 के दौर में सबसे ज्यादा दलबदल हुआ है।

जरा याद करिये 1977 में जहां पूर्व कांग्रेसी मोरारजी देसाई केन्द्र में पहले गैर कांग्रेसी सरकार के मुखिया बने, वहीं बाद में विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर और देवगौड़ा ने इस परम्परा को आगे बढ़ाया। भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संस्करण भारतीय जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी भी लंबे समय तक कांग्रेस से जुड़े रहे। दरअसल राजनीतिक ख्वाबों के पीछे भागने की अद्भुत दौड़ है इसीलिये आस्था एवं सिद्धान्तों को बदलने का यह खेल सिर्फ व्यक्तिगत स्तर तक ही सीमित नहीं है, बल्कि राजनीतिक दल भी इस खेल में लगातार शामिल होते रहे हैं। खासकर जब से गठबंधन सरकार का दौर चला है तो छोटे और क्षेत्रीय दलों की चांदी हो गई है। दलबदलुओं का स्वागत टिकटों के तोहफे के साथ होने से ऐसे आसार हैं कि आने वाले महीनों में दल-बदल की तस्वीर उत्तर प्रदेश में और रंगीन होगी। लेकिन यह दलबदल राजनीतिक सिद्धान्तों एवं मूल्यों का बड़ा मजाक है।

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