प्रेरणास्त्रोत: भगवान हमारे हैं

God is ours

धन का संग केवल जीवित अवस्था तक है

प्रभु सारे जगत में मौजूद हैं बस जरूरत है विवेक की। विवेकी सब कुछ पा जाता है और साधारण व्यक्ति जो पुरुषार्थ नहीं करता वह पछताता रहता है। विवेकी ढूंढता है कि मैं कौन हूं? ढूंढते ढूंढते वह उसके उत्तर में आनंद पा जाता है। वहीं आत्मा-वही आनंद वास्तव में जो हमारा लक्ष्य है। तन और मन को प्रभु के नाम से भर लो। प्रभु का नाम सदा हितकारी है। प्रभु को सदा नमन करो। वे बुद्धि के दाता हंै। प्रभु से सदा बुद्धि को मांगना। बुद्धि मृत्यु के बाद भी साथ देती है। धन पर भरोसा मत करना। बुद्धि पर विश्वास करना। बुद्धि हर जन्म में साथ निभाएगी। धन का संग केवल जीवित अवस्था तक है। जीवन में धन का आना अच्छी बात है किंतु उसका कुछ अंश धर्म पर खर्च हो तो और भी अच्छी बात होगी।

जो मनुष्य धर्म का पालन करता है उस पर भगवान सदा प्रसन्न रहते हैं

धन कमाने में व्यक्ति बड़ा होशियार है किंतु धर्म को प्राप्त करने में वह सोचता है। उसकी संकीर्णता उसे धर्म की ओर जाने से रोकती है। उसे ज्ञान का सहारा लेकर उदान बनना होगा। जिस तत्परता से वह सुखी होना चाहता है। उसी लगन से उसे धर्म की शरण में जाना होगा। धर्म, परमात्मा को बड़ा प्रिय है। वे धर्म की रक्षा के लिए सदा तत्पर रहते हैं। जो मनुष्य धर्म का पालन करता है उस पर भगवान सदा प्रसन्न रहते हैं। रामजी ने एक बार नारदजी से कहा तुम कोई वर मांगो। नारद जी ने कहा हे प्रभु आप मुझे वर देना चाहते हैं तो ऐसा वर दीजिए कि सदा आपके चरणों की भक्ति करता रहूं। और आपकी माया मुझे कभी भी मोहित न कर सके। राम जी ने मुस्कराते हुए कहा-हे नारद ऐसा ही होगा।

जो मनुष्य अपने मन को इस सहर्ष जोड़कर रखता है वह बड़ा भाग्यशाली है। संसार और संसार के पदार्थ असार हैं। मनुष्य का एक-एक श्वांस बड़ा अनमोल है। उसके जीवन का बड़ा महत्व है। ईश्वर ने भी उसे सर्वश्रेष्ठ घोषित किया है। परमात्मा कहते हैं कि मेरा मानव सबसे श्रेष्ठ है। मैंने सबसे ज्यादा बुद्धिमान इंसान को बनाया है। मनुष्य मेरा अंश है। वह चाहे तो अपने साधनों से मुझ तक (परमात्मा) आ सकता है।

 

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