संपादकीय : बिना परीक्षा छात्रों का भविष्य कैसा होगा

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दे श में कोरोना काल का ग्रहण हर क्षेत्र पर भारी पड़ा है। इसके चलते देश को जो जनधन हानि हुई उसकी भरपाई मुमकिन नहीं है। बोर्ड परीक्षा में शामिल होने वाले छात्र छात्राओं के लिए कोरोना संक्रमण के बीच परीक्षाओं का रद्द होना सबसे ज्यादा कष्टदाई रहा है। हाईस्कूल एवं इंटरमीडियट के प्रदेशिक बोर्ड, सीबीएसई, सीआईएससीई बोर्ड के छात्र छात्राओं और उनके अभिभावकों की मनोदंशा, भविष्य को लेकर चिन्ता तथा आने वाले परिणामों का बिना परीक्षण मानकों के अनुपात में परीक्षा परिणाम का घोषित होना उलझन साबित हो रहा है। इन परिणामों का का भविष्य में कितना महत्व होगा, ये भी समस्या आएगी। सत्र 2021 के बोर्ड परीक्षार्थियों की आगामी प्रतियोगी परीक्षाओं में क्या स्थिति होगी? इस तरह के तमाम सवाल बोर्ड परीक्षा में बैठने वाले बच्चों एवं अभिभावकों के मन में उथल पुथल मचा रहे हैं। यह भी चर्चा है कि क्रमोन्नत बच्चों की पढ़ाई को लेकर भी तरह तरह की चर्चाए आगे होंगी।
यही नहीं अब तक जिस तरह से परीक्षाओं के बाद परिणाम आने पर छात्र छात्राओं को उत्साह और उत्सुकता होती थी, वह इस बार नही दिखेगी। यही नहीं समय परिस्थिति, पाठ्यक्रम और संसाधनों के आधार पर सीबीएसई, सीआईएससीई बोर्ड के मूल्यांकन निर्धारण का अनुकरण प्रादेशिक बोर्ड नहीं कर पाएंगे। हमारी शिक्षा प्रणाली पूरी तरह परीक्षा केंद्रित है और इसमें भी बोर्ड परीक्षाओं का महत्व सबसे ज्यादा है। अब सबसे जटिल सवाल यह होगा कि इन परीक्षाओं का विकल्प क्या होगा? विकल्प भी ऐसा होना चाहिए, जो न्यायसंगत और सर्वमान्य हो। बोर्ड की परीक्षाओं से नौजवानों का भविष्य काफी हद तक तय होता है। यूं भी 10वीं की परीक्षा के नतीजे से यह तय होता है कि छात्र आगे क्या पढ़ सकता है और 12वीं के नतीजे से यह तय होता है कि छात्र को आगे की पढ़ाई के लिए कहां दाखिला मिल सकता है।
परीक्षा नहीं हो सकी ऐसे में साल भर की मेहनत, किताबें, फीस, बोर्ड परीक्षा की अलग से फीस के बदले छात्र छात्राओं और अभिभावकों को क्या मिला? भले ही इस बीच 10वीं की परीक्षा की जगह स्कूल के आंतरिक मूल्यांकन के जरिये बच्चों की क्षमता आंकने का एक पैमाना सीबीएसई ने बनाया है, परन्तु उसे भी दिल्ली हाईकोर्ट में एक संस्था द्वारा चुनौती दे दी गई है। सीबीएसई का इसके पीछे यह विचार हो सकता है कि स्कूल अपने बच्चों को अंक देने में मनमानी न करें, इसलिए उनके पिछले तीन साल के नतीजों को भी एक मानक माना जाएगा। इस पर अदालत में चुनौती देने वाली संस्था का कहना है कि यह बच्चों के साथ अन्याय है कि उनके प्रदर्शन को स्कूल व शिक्षकों के प्रदर्शन के आधार पर ही आंका जाए। वर्ष 2021 के हाई स्कूल और इन्टरमीडियट में क्रमोन्नत होने वाले बच्चों के लिए ये बिना परीक्षा का परिणाम उत्साहविहीन और ताउम्र याद रहने वाली घटना बन गई है।

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