आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी...फिर भी स्वाभिमान में कभी कमी नहीं...

आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी...फिर भी स्वाभिमान में कभी कमी नहीं...

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एक छोटे से घर में रहने वाली एक विधवा अध्यापिका अपने दो बेटों के साथ जीवन गुजार रही थी। आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी, लेकिन उसके हौसले और स्वाभिमान में कभी कमी नहीं आई। वह स्वयं संस्कृत पढ़ाती और उससे मिलने वाली थोड़ी-सी आय से घर चलाती थी। गरीबी कितनी भी कठिन क्यों न हो, उसने कभी किसी के सामने सहायता के लिए हाथ नहीं फैलाया। उसके स्वाभिमान और संघर्ष की चर्चा धीरे-धीरे एक बड़े सेठ तक पहुंची। सेठ के कोई संतान नहीं थी। वह निर्धन बच्चों की शिक्षा में सहयोग करना चाहता था। एक दिन वह अध्यापिका के घर पहुंचा और बोला, ‘‘बहन, मैं चाहता हूं कि आपके दोनों बेटों की पढ़ाई में कोई बाधा न आए। कृपया यह धन स्वीकार कर लीजिए।’’ अध्यापिका ने विनम्रता से हाथ जोड़ दिए।

बोली, ‘‘आपका स्नेह मेरे लिए बहुत मूल्यवान है, लेकिन शायद आपको मेरी दौलत का अंदाजा नहीं है। मैं इतनी गरीब नहीं हूं कि अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा न दे सकूं।’’ सेठ चकित रह गया। उसने पूछा, ‘‘आपकी दौलत आखिर है कहां?’’ अध्यापिका ने मुस्कुराकर दोनों बेटों को आवाज दी। दोनों तुरंत आए, मां के चरण स्पर्श किए और फिर सेठ को प्रणाम किया। मां ने उनकी ओर गर्व से देखते हुए कहा, ‘‘यही हैं मेरी सबसे बड़ी दौलत।’’ सेठ की आंखें भर आईं। उसने कहा, ‘‘आप बिल्कुल सही कहती हैं। जिनकी संतान संस्कारी और गुणवान हो, उनसे अधिक धनवान भला कौन हो सकता है?’’ अध्यापिका ने आग्रह किया कि वह धन किसी अनाथ बच्चे की शिक्षा में लगा दे। सेठ ने उसकी बात मान ली। उस दिन उसे समझ आया कि धन तिजोरी में नहीं, संस्कारों में सुरक्षित रहता है।

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