चिकित्सा शिक्षा में आरक्षण के मायने

0
152
medical education sachkahoon

पिछड़े वर्ग की लंबे समय से चल रही मांग पर केंद्र सरकार ने विराम लगा दिया। अब राज्य सरकारों के चिकित्सा महाविद्यालयों में भी केंद्रीय कोटे के अतंर्गत आरक्षित 15 प्रतिशत सीटों पर पिछड़ा वर्ग के छात्रों को 27 और आर्थिक रूप से कमजोर (ईडब्ल्यूएस) छात्रों को 10 फीसदी आरक्षण का अतिरिक्त लाभ मिलेगा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के निर्देश पर केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने यह फैसला लिया है।

हालांकि केंद्र सरकार के मेडिकल कॉलेजों में यह व्यवस्था पहले से ही लागू है। अब तक राज्य सरकार के कॉलेजों केंद्रीय कोटा के तहत सिर्फ अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जन जाति के छात्रों को ही आरक्षण का लाभ मिलता था। इस निर्णय के बाद नीट की सभी 15 प्रतिशत अखिल भारतीय सीटों पर यह आरक्षण लागू हो जाएगा। आरक्षण यह लाभ क्रीमी-लेयर के दायरे में आने वाले छात्रों को नहीं मिलेगा। साफ है, पिछड़े वर्ग की जातियों को यह लाभ केंद्रीय सूची के हिसाब से मिलेगा। इस लाभ को उत्तर-प्रदेश व गुजरात में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के परिप्रेक्ष्य में भी देखा जा रहा है।

क्योंकि कांग्रेस समेत अन्य विपक्षी दल भाजपा की केंद्र में सरकार बनने के बाद से ही यह आरोप लगाते रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जातीय आरक्षण के पक्ष में नहीं है। दरअसल, आरक्षण की पुनर्समीक्षा और आर्थिक आधार पर आरक्षण के मुद्दे पर संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कहा था कि ‘समूचे राष्ट्र का वास्तविक हित का ख्याल रखने वाले और सामाजिक समता के लिए प्रतिबद्ध लोगों की एक समिति बने, जो विचार करे कि किन वर्गों को और कब तक आरक्षण की जरूरत है। इस सुझाव के आने के साथ जो बहस छिड़ी थी, उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को कहना पड़ा था कि आरक्षण किसी भी सूरत में समाप्त नहीं किया जाएगा, आरक्षण का यह प्रावधान इसी कड़ी में किया लगता है।

वर्तमान में एमबीबीएस की कुल 84,649 सीटें हैं। इनमे ंसे करीब 50 फीसदी सरकारी मेडिकल कॉलेजों की हैं। अर्थात इस निर्णय के बाद ओबीसी के लिए करीब 1713 सीटें बढ़ जाएंगी। आरक्षण का यह लाभ पीजी, बीडीएस, एमडीएस, एमडी और डिप्लोमा के छात्रों को भी मिलेगा। सर्वोच्च न्यायालय के 2007 में आए फैसले के अनुसार एस.सी को 15 और एसटी को 7.5 प्रतिशत आरक्षण मिल रहा था। ओबीसी इस लाभ वंचित थे। इसलिए सरकार पर लगातार अतिरिक्त आरक्षण देने का दबाव बड़ रहा था। भाजपा के पिछड़े वर्ग से आने वाले सांसदों ने भी सरकार से यह मांग हाल ही में की थी। साफ है, भाजपा का एक वर्ग इस आरक्षण के समर्थन में था। गोया, योग्यता पर जात-पात को महत्व दे दिया गया। तय है आरक्षण का अंत निकट भविष्य में मुश्किल है?

हालांकि संविधान में आरक्षण की व्यवस्था की पैरवी करते हुए आरक्षण के जो आधार बनाए गए हैं, उन आधारों की प्रासंगिकता की तार्किक पड़ताल करने में कोई बुराई नहीें थी? दरअसल समाज में असमानता की खाई पाटने की दृष्टि से सामाजिक आर्थिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े हुए लोगों को समान और सशक्त बनाने के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण के संवैधानिक उपाय किए गए थे। इसी नजरिए से मंडल आयोग की सिफारिशें प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने 1990 में लागू की थीं। हालांकि इस पहल में उनकी सरकार बचाने की मानसिकता अंतर्निहित थी। इस समय अयोध्या में मंदिर मुद्दा चरम पर था।

देवीलाल के समर्थन वापसी से विश्वनाथ सरकार लड़खड़ा रही थी। इसे साधने के लिए आनन-फानन में धूल खा रही मंडल सिफारिशें लागू कर दी गईं। इनके लागू होने से कालांतर में एक नए तरह की जातिगत विषमता की खाई उत्तरोतर चौड़ी होती चली गई। इसकी जड़ से एक ऐसे अभिजात्य वर्ग का अभ्युदय हुआ, जिसने लाभ के महत्व को एकपक्षीय स्वरूप दे दिया। नतीजतन एक ऐसी ‘क्रीमी-लेयर’ तैयार हो गई, जो अपनी ही जाति के वंचितों को आरक्षण के दायरे से बाहर रखने का काम कर रही है।

दरअसल संविधान में आरक्षण का प्रबंध इसलिए किया गया था, क्योंकि देश में हरिजन, आदिवासी और दलित ऐसे बहुत से जाति समूह थे, जिनके साथ शोषण और अन्याय का सिलसिला शताब्दियों तक जारी रहा। लिहाजा उन्हें सामाजिक स्तर बढ़ाने की छूट देते हुए आरक्षण के उपायों को किसी समय-सीमा में नहीं बांधा गया। किंतु विश्वनाथ प्रताप सिंह ने पिछड़ों को आरक्षण देने के उपाय राजनीतिक स्वार्थ-सिद्धी के चलते इसलिए किए, जिससे उनका कार्यकाल कुछ लंबा खिंच जाए। जबकि ये जातियां शासक जातियां रही हैं। अनुसूचित जातियों और जनजातियों का टकराव भी इन्हीं जातियों से ज्यादा रहा है।

गोया, आरक्षण के आर्थिक परि प्रेक्ष्य में कुछ ऐसे नए मापदंड तलाशने की जरूरत है, जो आरक्षण को सिद्धांतनिष्ठ समरूप दिशा देने का काम करे। भारतीय समाज के हिंदुओं में पिछड़ेपन का एक कारक निसंदेह जाति रही है। लेकिन आजादी के बाद देश का जो बहुआयामी विकास हुआ है, उसके चलते पिछड़ी जातियां मुख्यधारा में आकर सक्षम भी हुई हैं। इसलिए मौजूदा परिदृश्य में पिछड़ेपन का आधार एकमात्र जाति का निम्न या पिछड़ा होना नहीं रह गया है। लोक-कल्याण व बढ़ते अवसरों के चलते केवल अतीत में हुए अन्याय को पिछड़ने का आधार नहीं माना जा सकता? अत: वक्त का तकाजा था कि आरक्षण को नई कसौटियों पर कसा जाता? वर्तमान समय में किस समुदाय विशेष की स्थिति कैसी है, इसकी सुनिश्चता पुराने आंकड़ों के वनस्वित नए प्रमाणिक सर्वेक्षण कराकर किया जाता।

इस लिहाज से सर्वोच्च न्यायालय का किन्नरों को आरक्षण का लाभ देने का फैसला अहम है। इस निर्णय की मिसाल पेश करते हुए न्यायालय ने दलील दी थी कि ‘ऐसे वंचित समूहों की पहचान की जा सकती है, जो वास्तव में विशेष अवसर की सुविधा के हकदार हैं, परंतु उन्हें यह अधिकार नहीं मिल रहा है। ‘ऐसे ही समावेशी उपाय खोज कर आरक्षण सुविधा को प्रासंगिक और वंचितों के सर्वांगीण विकास का आधार बनाया जाए तो इसे मोदी सरकार की मौलिक उपलब्धि माना जा सकता है, किंतु अब लगता है कि केंद्र सरकार ने आरक्षण में बदलाव की संभावनाओं पर विराम लगाकर विरोधियों के समक्ष हथियार डाल दिए हैं। सामाजिक बराबरी का लक्ष्य तो तब पूरा होगा, जब शिक्षा और नौकरी में समानता आए और एक ही लकीर पर खड़े होकर विद्यार्थी प्रतिस्पर्धा की दौड़ लगाएं?

अन्य अपडेट हासिल करने के लिए हमें Facebook और TwitterInstagramLinkedIn , YouTube  पर फॉलो करें।