National Emergency India: भारत में राष्ट्रीय आपातकाल लगाना अब इतना आसान नहीं, 1975 के बाद बदले संविधान के नियम; जानें क्या हैं प्रावधान

भारत में राष्ट्रीय आपातकाल लगाना अब इतना आसान नहीं, 1975 के बाद बदले संविधान के नियम; जानें क्या हैं प्रावधान

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National Emergency India: देश की राजधानी दिल्ली में प्रदर्शनों और पुलिस की कार्रवाई के बीच राष्ट्रीय आपातकाल को लेकर एक बार फिर चर्चा तेज हो गई है। राजधानी में पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती तथा प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिए जाने की खबरों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या आज के दौर में राष्ट्रीय आपातकाल लागू करना आसान है? वर्ष 1975 में लगाए गए आपातकाल के बाद संविधान में कई अहम बदलाव किए गए, ताकि असाधारण शक्तियों का मनमाने ढंग से इस्तेमाल न हो सके।

25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार की सलाह पर देश में राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया था। उस समय संविधान के तहत आंतरिक अशांति को आधार बनाया गया था। आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं पर व्यापक प्रतिबंध लगे, विपक्षी नेताओं को गिरफ्तार किया गया और प्रेस पर सेंसरशिप लागू कर दी गई। राजनीतिक गतिविधियां भी बुरी तरह प्रभावित हुईं।

मार्च 1977 में आपातकाल समाप्त होने के बाद मोरारजी देसाई के नेतृत्व वाली सरकार ने संविधान में बदलाव की दिशा में कदम उठाए। इसी क्रम में 44वां संविधान संशोधन अधिनियम, 1978 लाया गया। इसका उद्देश्य आपातकाल घोषित करने की प्रक्रिया को अधिक कठोर बनाना और नागरिकों के अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना था।

क्या आज भी लगाया जा सकता है राष्ट्रीय आपातकाल?

हां, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आज भी राष्ट्रीय आपातकाल घोषित किया जा सकता है। हालांकि, इसके लिए निर्धारित संवैधानिक शर्तों को पूरा करना जरूरी है।

44वें संविधान संशोधन के बाद राष्ट्रीय आपातकाल केवल युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह की स्थिति में घोषित किया जा सकता है, जब भारत या उसके किसी हिस्से की सुरक्षा को गंभीर खतरा हो।

पहले संविधान में आंतरिक अशांति को भी आपातकाल का आधार बनाया जा सकता था। 44वें संशोधन के जरिए इस शब्द को हटाकर सशस्त्र विद्रोह का अधिक सीमित आधार निर्धारित किया गया।

इसका मतलब है कि केवल राजनीतिक विरोध, धरना-प्रदर्शन या सामान्य कानून-व्यवस्था की समस्या अपने आप में राष्ट्रीय आपातकाल लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है। ऐसी स्थिति में संविधान के अन्य प्रावधानों और सामान्य कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश अनिवार्य

राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करने की प्रक्रिया में केंद्रीय मंत्रिमंडल की भूमिका बेहद अहम है। संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति तभी आपातकाल की घोषणा कर सकते हैं, जब केंद्रीय मंत्रिमंडल का फैसला लिखित रूप में उन्हें भेजा गया हो।

इस प्रावधान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि प्रधानमंत्री अकेले अपनी इच्छा से राष्ट्रीय आपातकाल घोषित नहीं कर सकें। इसके लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल की सामूहिक जिम्मेदारी और औपचारिक लिखित सिफारिश जरूरी है।

संसद की मंजूरी के बिना जारी नहीं रह सकता आपातकाल

राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा होने के बाद उसे एक महीने के भीतर संसद के दोनों सदनों से मंजूरी मिलना अनिवार्य है। इसके लिए विशेष बहुमत की जरूरत होती है।

विशेष बहुमत का अर्थ है कि संबंधित सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित होकर मतदान करने वाले सदस्यों में से कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन मिलना चाहिए।

संसद से मंजूरी मिलने के बाद आपातकाल छह महीने तक जारी रह सकता है। इसे आगे भी जारी रखने के लिए प्रत्येक छह महीने की अवधि पूरी होने से पहले संसद के दोनों सदनों से दोबारा विशेष बहुमत के साथ मंजूरी लेना जरूरी है।

इस व्यवस्था से यह सुनिश्चित करने की कोशिश की गई है कि राष्ट्रीय आपातकाल अनिश्चितकाल तक बिना संसदीय समीक्षा के जारी न रहे।

आपातकाल में भी सुरक्षित रहते हैं ये मौलिक अधिकार

44वें संविधान संशोधन ने नागरिकों के मौलिक अधिकारों की सुरक्षा को मजबूत किया। संविधान के अनुच्छेद 20 और 21 को विशेष संरक्षण दिया गया है।

  • अनुच्छेद 20: आपराधिक मामलों में दोषसिद्धि के संबंध में कुछ महत्वपूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, जैसे किसी व्यक्ति को उस समय अपराध न रहे कृत्य के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता।

  • अनुच्छेद 21: प्रत्येक व्यक्ति को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण देता है। कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना किसी व्यक्ति को इनसे वंचित नहीं किया जा सकता।

राष्ट्रीय आपातकाल के दौरान भी इन दोनों अनुच्छेदों के तहत अधिकारों के प्रवर्तन के लिए अदालत जाने का अधिकार अनुच्छेद 359 के आदेश से निलंबित नहीं किया जा सकता। हालांकि, आपातकाल के दौरान अन्य अधिकारों और उनके प्रवर्तन पर संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार प्रभाव पड़ सकता है।

1975 के बाद क्या बदला?

1975 के आपातकाल के अनुभव के बाद संविधान में ऐसे सुरक्षा उपाय जोड़े गए, जिनसे राष्ट्रीय आपातकाल की घोषणा के लिए अधिक स्पष्ट आधार, केंद्रीय मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश, संसद की विशेष बहुमत से मंजूरी और मौलिक अधिकारों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।

इसलिए आज राष्ट्रीय आपातकाल घोषित करना संवैधानिक रूप से संभव तो है, लेकिन इसके लिए कड़ी शर्तें पूरी करनी होती हैं। केवल प्रदर्शन, राजनीतिक अस्थिरता या सामान्य कानून-व्यवस्था की चुनौती के आधार पर इसे लागू नहीं किया जा सकता।

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