वैश्विक निवेशकों की पसंद क्यों बनता जा रहा है भारत
वैश्विक निवेशकों की पसंद क्यों बनता जा रहा है भारत
डॉ. मयंक चतुर्वेदी। भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर समय-समय पर अलग-अलग तरह की चर्चाएं होती रही हैं। कभी विदेशी निवेश में कमी की बात सामने आती है तो कभी यह कहा जाता है कि वैश्विक कंपनियां भारत में निवेश को लेकर पहले जैसी उत्सुक नहीं हैं। ऐसे समय में संसद में प्रस्तुत ताजा आंकड़े एक अलग तस्वीर सामने रखते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत ने सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के रूप में 94.84 अरब डॉलर प्राप्त किए, जो अब तक का सबसे बड़ा स्तर माना जा रहा है। यह उपलब्धि दर्शाती है कि बदलते वैश्विक आर्थिक वातावरण के बीच भी भारत निवेशकों के भरोसेमंद देशों में अपनी मजबूत उपस्थिति बनाए हुए है।
वित्त मंत्रालय की ओर से संसद में दी गई जानकारी के अनुसार, वित्त वर्ष 2024-25 में सकल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 80.61 अरब डॉलर था, जो अगले वर्ष बढ़कर 94.84 अरब डॉलर तक पहुंच गया। इसी अवधि में शुद्ध प्रत्यक्ष विदेशी निवेश भी उल्लेखनीय रूप से बढ़ा। इससे संकेत मिलता है कि विदेशी निवेशकों का विश्वास भारतीय अर्थव्यवस्था और उसके दीर्घकालिक विकास की संभावनाओं पर मजबूत बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि शुद्ध निवेश के आंकड़ों को समझते समय इस तथ्य पर भी ध्यान देना चाहिए कि विदेशी कंपनियां लाभ अर्जित करने के बाद उसका कुछ हिस्सा अपने देश वापस ले जाती हैं। यह अंतरराष्ट्रीय निवेश व्यवस्था की सामान्य प्रक्रिया है। दूसरी ओर भारतीय कंपनियां भी अब विदेशों में तेजी से निवेश कर रही हैं। इसलिए पूंजी का बाहर जाना हमेशा आर्थिक कमजोरी का संकेत नहीं होता, कई बार यह भारतीय उद्योगों के वैश्विक विस्तार का भी परिचायक बनता है।
पिछले एक दशक में निवेश के वातावरण को बेहतर बनाने के लिए अनेक नीतिगत सुधार किए गए हैं। रक्षा, रेल, बीमा, नागरिक उड्डयन, कोयला, अंतरिक्ष, दूरसंचार, व्यापार और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में निवेश संबंधी नियमों को अधिक सरल बनाया गया। साथ ही उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजनाएं, व्यापार सुगमता में सुधार, कर व्यवस्था का सरलीकरण, दिवाला समाधान प्रणाली और आधारभूत ढांचे के विस्तार जैसे कदमों ने निवेशकों के लिए अनुकूल वातावरण तैयार किया है।
भारत में आने वाले प्रत्यक्ष विदेशी निवेश का बड़ा हिस्सा सिंगापुर और मॉरीशस के माध्यम से आता रहा है। इनके अलावा अमेरिका, नीदरलैंड, जापान, संयुक्त अरब अमीरात, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और अन्य देशों की कंपनियां भी लगातार निवेश बढ़ा रही हैं। हाल के वर्षों में भारत और संयुक्त अरब अमीरात के बीच आर्थिक सहयोग मजबूत होने से वहां से निवेश में वृद्धि दर्ज की गई है। जापान ने औद्योगिक गलियारों, परिवहन और वाहन निर्माण में उल्लेखनीय योगदान दिया है, जबकि अमेरिकी प्रौद्योगिकी कंपनियां भारत को डिजिटल विकास के प्रमुख केंद्र के रूप में देख रही हैं। आज इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्माण, अर्धचालक उद्योग, ऊर्जा, रक्षा उत्पादन, मोटर वाहन उद्योग, भंडारण और परिवहन व्यवस्था तथा उन्नत विनिर्माण क्षेत्रों में भी बड़े निवेश हो रहे हैं। इससे देश में रोजगार, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और औद्योगिक क्षमता को नया बल मिलने की संभावना बढ़ी है। संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास सम्मेलन की हाल की रिपोर्ट भी भारत को विश्व के प्रमुख निवेश गंतव्यों में शामिल करती है।
हरित ऊर्जा और डिजिटल आधारभूत ढांचे से जुड़े बड़े निवेश प्रस्ताव भी भारत के प्रति वैश्विक विश्वास को मजबूत करते हैं। बड़े डेटा केंद्रों, स्वच्छ ऊर्जा, हरित हाइड्रोजन और आधुनिक औद्योगिक परियोजनाओं में निवेश की घोषणाएं यह संकेत देती हैं कि अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत को भविष्य की अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भागीदार मान रही हैं। ऐसे निवेश लंबे समय में उत्पादन, रोजगार और निर्यात क्षमता को भी बढ़ावा दे सकते हैं। भारतीय उद्योग समूह भी अब वैश्विक स्तर पर अपनी उपस्थिति मजबूत कर रहे हैं। अनेक भारतीय कंपनियां विदेशों में नए संयंत्र स्थापित कर रही हैं, अधिग्रहण कर रही हैं और विभिन्न देशों में अपने कारोबार का विस्तार कर रही हैं। यह परिवर्तन दर्शाता है कि भारत अब निवेश प्राप्त करने वाला देश भर नहीं रह गया है, बल्कि विश्व अर्थव्यवस्था में सक्रिय निवेशक के रूप में भी अपनी पहचान बना रहा है।
आर्थिक उपलब्धियों का मूल्यांकन राजनीतिक दृष्टिकोण से अधिक तथ्यों के आधार पर होना चाहिए। रिकॉर्ड प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यह संकेत देता है कि वैश्विक निवेशक भारत की विकास क्षमता, बड़े उपभोक्ता बाजार, स्थिर नीतियों और भविष्य की संभावनाओं पर भरोसा जता रहे हैं। इस विश्वास को बनाए रखना और उसे नई ऊंचाइयों तक पहुंचाना आने वाले समय की सबसे महत्वपूर्ण आर्थिक जिम्मेदारी होगी।
यह लेखक के अपने विचार हैं